आस्तीन के सांप

जग में बच के रहो आस्तीन के सांपों से

कभी एतबार मत करना इनके वादों पे 

अवसर मिलते ही डस लेते हैं ये अक्सर 

मन को मोह लेते हैं अपनी मीठी बातों से

मेरे मुंह पर मेरे तेरे मुंह पर हो जाते तेरे

मुंह में राम बगल में छुरी लेकर जी रहे

कौन है अपना कौन पराया कैसे जाने 

कैसे बच के जिए अपनों के ही धोखों से 

रोज गले मिलते हैं बनकर हमदम लोग

पीठ में छुरा घोंपते है अपने बनकर लोग

पहन मुखौटा दे रहे ये दुनिया को धोखा

बचकर कैसे रहें भला आस्तीन के सांपों से


स्वरचित एवं मौलिक

अलका शर्मा, शामली, उत्तर प्रदेश