देश की रोटी

भरत ! भरत उठिए न, अरे ! उठिए तो सही।"सुधा घबराई सी थी।अरे सुधा क्या हुआ ? आज तो संडे है।सोने दो न प्लीज।चादर को सिर तक खींचते हुए भरत ने कहा।

अरे भरत उठो देखो  वर्मा जी के यहाँ कुछ तो हुआ है, उनके घर के बाहर दो दिन से न तो किसी ने पेपर उठाया है न दूध के पैकेट।ओफ़्फ़ओ.... तो कहीं बाहर गए होंगे तुम क्यों परेशान हो रही हो।"भरत तुमभी न... अगर कहीं जाते तो मुझे बोलकर और चाभी देकर जाते और फिर मेन गेट पर ताला भी तो होता।अब उठ भी जाओ न चलकर देखते है।" लगभग भरत को झकझोरते हुए सुधा ने कहा था।

क्या यार सुधा संडे के दिन भी नहीं सोने देती, चलो बिना जाए तो मानेगी नहीं तुम, औरतों से तो भगवान ही बचाए।" अपनी चप्पल पहनते हुए भरत कमरे के बाहर आया।अरे ! ऐसे क्यों  कर रहे हो, हम उनके पड़ोसी हैं हमारा फर्ज बनता है उनकी खोज खबर रखना।अकेले रहते हैं हम नहीं देखेंगे कौन देखेगा ? चलो अब जल्दी से चलो और एक अच्छे पड़ोसी का धर्म निभाओ।" दोनों जल्दी-जल्दी सीढ़ियां उतरने लगे सड़क के उस पार ठीक सामने ही वर्मा जी का मकान था। घर इसलिए नही कहूँगी क्योंकि घर तो परिवार से बनता है न ?

 और परिवार के नाम पर अकेले वर्मा जी ही रहते थे उनकी पत्नी को गुजरे अभी दो साल ही हुए थे। उनका बेटा राहुल जो ऑस्ट्रेलिया में रहता था मां के देहांत के समय भारत आया था। माँ के न रहने पर राहुल वर्मा जी को अपने साथ ऑस्ट्रेलिया ले गया था पर महीने दो महीने में ही वह वापस आ गए थे। वर्मा जी के घर पहुंच कर भरत ने डोर बेल बजाई लगभग पाँच मिनट तक कोई उत्तर न मिलने पर दोनों घबरा गए एक-दूसरे का मुंह देखने लगे जाने क्या हुआ होगा।

 देखो !सुधा मैंने कहा था ना वह घर पर नहीं है घर पर होते तो क्या दरवाजा नहीं खोलते क्या ? पर घर अंदर से बंद है।बाहर कहीं गए होते तो ताला लगा कर जाते हैं कुछ तो गड़बड़ है। तो अब क्या करें कोई आसपास जान पहचान का भी नहीं है ताला तोड़ने की कोशिश करें।"

अरे नहीं ! यह गलत होगा | तब तक आसपास के भी कुछ लोग इकट्ठा हो गए थे उनमें से किसी ने सुझाव दिया पुलिस को बुलाना उचित होगा और भरत ने पुलिस को फोन लगा दिया पुलिस के आने पर दरवाजा खोला गया, अंदर का दृश्य देख सुधा के पैरों तले जमीन के सरक गई। 

वर्मा जी अब इस दुनिया में नहीं थे।सुधा ने यह तो बिल्कुल नहीं सोचा था। राहुल महज दस साल का था जब वर्मा जी अपनी धर्मपत्नी के साथ इस बंगले में शिफ्ट हुए थे। बहुत ही शानदार गृह प्रवेश हुआ था।सरकारी विभाग में अधिकारी के ओहदे पर थे वर्मा जी। श्रीमती वर्मा भी बहुत शांत स्वभाव की थी सबसे हंसी खुशी, मिलना-जुलना सबसे हंस के बातें करना उनके स्वाभाव में शामिल था।

 उनकी पूरी दुनिया राहुल के आगे पीछे ही घूमती थी |नहलाना धुलना तैयार करना स्कूल के लिए ले जाना उसका होमवर्क करना उसकी हर पसंद नापसंद का ध्यान रखना उनकी दिनचर्या में शामिल था। कभी-कभी वर्मा जी शिकायत भी करते थे कि जब से राहुल पैदा हुआ है आप तो बेटे की ही होकर रह गई हो हमारा तो ख्याल ही नहीं रहता। श्रीमति वर्मा जी भी हंस कर बातों को टाल जाती।

फिर कुछ दिन बाद तो राहुल के दादा-दादी जी भी आ गए थे।  माता-पिता का ख्याल रखना तो कोई वर्मा जी से सीखे हथेलियों पर रखते थे वह अपने माता पिता को। किसी ने कहा भी था कि आप इस उम्र में इन्हें यहां क्यों लाए ? क्या शहर की आबो  हवा इन्हें रास आएगी ? बहुत खूबसूरत मन को छूने वाला जवाब दिया था, जब अपनों का साथ हो तो सब कुछ रास आता है, हंसी भी खुशी भी और आंसू भी। उनके गृह प्रवेश के समय से ही मिसेज एंड मिस्टर वर्मा जी से एक अलग ही लगाव हो गया था।

 इस पूरे परिवार के आसपास के लोग संस्कारों के मिसाल दिया करते थे कि  कोई वर्मा फैमिली से सीखे परिवार में कैसे रहा जाता है।राहुल सभी के लाड दुलार का केंद्र बिंदु था। हर एक चीज उसकी पसंद से होती थी।उसे खाने में क्या पसंद है, उसे क्या पहनना पसंद है हर एक चीज का ख्याल माता-पिता दादा सभी रखते थे।राहुल खुद भी बहुत प्यारा बच्चा था समय अपनी गति से चलता रहा और दादा-दादी एक-एक करके स्वर्ग सिधार गए। वर्मा दंपति बहुत मुश्किल से खुद को संभाला था। इस घर में और कौन-कौन रहता है पुलिस के इस प्रश्न ने सुधा वर्तमान में आई, सुधा हड़बड़ाई सी कहा जी, वर्मा अंकल और उनका नौकर हरिया काका।

 अभी वह कहां है पुलिस ने फिर पूछा, जी मुझे नहीं पता सुधा ने थोड़ा डरते हुए कहा था। और इनका कोई रिश्तेदार ? पुलिस के सवाल जारी थे  सुधा ने कहा जी इनका बेटा राहुल जो विदेश में रहता है मैं उनको खबर कर देती हूं, उनका नंबर है मेरे पास। सुधा ने जैसे-तैसे खुद को संभालते हुए राहुल को फोन लगाया और उसे यहां का सारा हाल बता कर जल्दी आने को कहा।

राहुल की जो प्रतिक्रिया थी वह सुनकर सुधा थोड़ा आश्चर्यचकित थी। वह माता-पिता जिन्होंने उसकी परवरिश में कोई कसर न रहने दी उनकी मौत की खबर ने भी राहुल को जरा सा विचलित नहीं किया था।आखिर क्यों ? जब राहुल ने विदेश जाने की जिद की थी कितना समझाया था दोनों ने वर्मा आंटी का तो बुरा हाल था। कितना समझाया था अपने देश में भी तो रोटी  है तुम्हें विदेश में ही नौकरी क्यों करनी है ? पर राहुल की जिद्दी थी विदेश में नौकरी करना।बेटा एक बार फिर सोच ले हमारा क्या होगा ? तेरे बिना हम कैसे रहेंगे ?"

ओफ़्फ़ ओ माँ  अभी इमोशनल ड्रामा मत शुरू करो,  आजकल विदेश कौन सा बहुत दूर है जब मनचाहा वीडियो कॉल किया और देख लिया जब मनचाहा फ्लाइट पकड़ी और आ गए मिलने और फिर सेटल होने के बाद मैं आप दोनों को अपने साथ ही रखूंगा इसमें क्या प्रॉब्लम है यहां रहो या वहां रहो।" कुछ इस तरह की दलील दी थी। राहुल ने।

अभी गंगा जमुना बहन बंद करो और मेरी जाने की तैयारी करो।" वहीं सोफे  पर बैठे पिताजी पेपर पढ़ते हुए सब कुछ सुन रहे थे उन्हें आंटी का दर्द समझ में आ रहा था पर बेटे की जिद्द के आगे कुछ नहीं बोल पा रहे थे।

मैं तो बस इत्तेफाकन उस दिन उनसे मिलने आ गई थी मेरा भी मन थोड़ा द्रवित हुआ था, और फिर एक बार जो बेटा विदेश गया वहीं का होकर रह गया। वर्मा आंटी को धक्का तब लगा जब पता चला कि राहुल ने वही शादी भी कर ली है।जो बेटा उनकी पूरी दुनिया थी उसने अपनी अलग दुनिया बना ली था, जिस परिवार के लोग मिसाल दिया करते थे आज वह बिखर रहा था पर बेटे की खुशी के आगे मां बाप ने अपनी ख़ुशी बिल्कुल नहीं सोची, शायद माता-पिता ऐसे ही होते हैं। हर हाल में बच्चों की खुशी चाहते हैं धीरे-धीरे वर्मा आंटी बीमार रहने लगे शायद बेटे की दूरी उन्हें अंदर ही अंदर खाए जा रहे थी और फिर ना बहू का मुंह देखा ना ही पोते पोतियो का। हमेशा मन में एक टीस रहती क्या इस दिन के लिए बेटा पैदा किया था ? 

फिर भी कुछ ना बोल पाते। वर्मा दंपति एक-दूसरे का बहुत ख्याल रखते थे आंटी की बीमारी में अंकल ने उनकी बहुत सेवा की और अब तो हरिया काका भी थे एकदम घर में परिवार के सदस्य जैसे अंकल के छोटे भाई हो। ईमानदारी से अपना सारा काम करते थे कभी-कभी अंकल कहते भी की अच्छा होता है कि तू ही हमारा बेटा होता और यह बात आंटी को अंदर तक बेध जाती। धीरे-धीरे बीमारी के आगे आंटी हार गई और अंकल अकेले रह गए। बमुश्किल ही बेटा आया था वह भी अंतिम संस्कार होने के बाद ना मां बेटे का मुंह देख पाई, ना बेटा मां का।

जैसे-तैसे बेटे ने पिताजी को साथ ले जाने के लिए तैयार किया अंकल का बिल्कुल भी मन नहीं था आंटी की यादों से दूर जाने का फिर भी सबके समझने के बाद अंकल जाने को तैयार हुए थे। वहां जाने के बाद उन्हें समझ में आया कि यहां की संस्कृति ही अलग है बूढ़े मां-बाप बच्चों के लिए बोझ है और यह अपमान और दुर्व्यवहार उनसे सहन ना हुआ और वह वापस भारत आ गए।

तब से हरिया काका और अंकल दोनों ही एक-दूसरे का ख्याल रखते थे और खुश रहते।उसके बाद ना अंकल ने कभी राहुल से बात की और ना ही राहुल ने अंकल की कोई सुध ली। इधर अंतिम संस्कार की तैयारी होने लगी। लोग इंतजार करने लगे राहुल कब आएगा शायद राहुल को आना मंजूर नहीं था या परिस्थितियाँ उसका साथ नहीं दे रही थी। भगवान जाने ! 

क्या सच था ?सुधा का ही मन नहीं माना और राहुल को वीडियो कॉल किया राहुल ने कहा आंटी में नहीं आ पाऊंगा मेरी छुट्टियां नहीं है और यहां पर स्थिति बहुत खराब है, सुधा ने मन में सोचा तुझे क्या कहूं मैं ? तेरे जैसे कपूत से तो बेऔलाद होना अच्छा है।अरे कम से कम अपने पापा का मुंह तो देख ले और उन्होंने अंकल के चेहरे से वह सफेद चादर हटा दी। राहुल को जैसे कोई ख़ास फर्क नही पड़ा था, उसने  जैसे तैसे वीडियो कॉल के जरिए  अंतिम संस्कार किया और लोग यही सोच रहे थे क्या इस दिन के लिए मां-बाप अपने बच्चों की सारी ख़ुशी पूरी करते हैं और उनके हर सपने पूरे करते हैं ताकि अंतिम पलों में वह इस कदर अकेले रह जाए।

यह कौन सी संस्कृति थी फोन के जरिए अंतिम संस्कार क्या उनकी आत्मा नही कचोटेगी नहीं। सुधा फफक पड़ी थी। कितना लाड था अंकल आंटी को राहुल से और राहुल ने क्या सिला दिया क्या विदेश की रोटी में यही संस्कार है इससे तो भली अपने देश की रोटी है। माना पैसे कम है पर अपनों का साथ भी तो है।जब बुरे वक्त में अपनों के साथ ही ना खड़े हो सकें फिर ऐसी नौकरी ऐसी जगह ऐसा देश किस काम का ?  यह संस्कृति परिवार अपने सगे संबंधी शायद अपने देश में ही है ।आज पड़ोसियों ने तो अंकल का अंतिम संस्कार कर दिया था अपने पड़ोसी होने का फर्ज निभाया था पर एक बेटे का फर्ज क्या था ?

 यह सोचकर सुधा और भरत की रूह कांप गई थी। दो महीने बाद राहुल आया और सारी जमीन ज़ायदाद बेचकर वापस विदेश चला गया। जाने क्या मजबूरी थी जो मां-बाप के अंतिम बार मिलना भी जरूरी नहीं समझा। यदि बुढ़ापा नौकरों के भरोसे ही निकालना है तो औलाद किस लिए ? नौकर ही अच्छे हैं परिवार जैसा शब्द शायद और कहीं नहीं, अपनों का अपनापन इस देश ने ही हैं | सुधा ने यह तय किया कि  अपने बच्चों के बच्चों को भी देश की जमीन से जोड़ कर रखेगी आगे भगवान की जो मर्जी। देश की रोटी सबसे अच्छी।


दामिनी सिंह ठाकुर,वरिष्ठ कवयित्री व कथाकार,

वरिष्ठ शिक्षिका व समीक्षका,इंदौर,मध्य प्रदेश