चारण भाट चमचा या भक्त

दिमाग में उठती तरह तरह की बातों को सोचते हुये पान की दुकान पर खड़े ताम्बूल चर्वण कर रहा था कि कोई पीठ थपथपाता सा लगा। देखा चिरकुट लाल था।

“अकेले  अकेले पान का मज़ा ले रहे हो भैया?”

पान चबाते चबाते मैंने पूछा “तो क्या इस महंगाई के जमाने में पूरे मोहल्ले के लोगों को बुलाकर पान खिलाऊँ?”

“न भैया! मुझ जैसे आपके भक्त को तो पान खिला सकते हो?”

मैंने तंबोली से कहा इसे पान देने के लिए और चिरकुट की तरफ मुडा और पूछा “तुम कब से मेरे भक्त हो गए?” “क्या भैया आपने जब से मेरे गान चच्छू खोले हैं तब से?”

“मैंने कब तुम्हारे ज्ञान चक्षु खोले थे?”

“भैया आप बूढ़े हो रहे हो, याद नहीं शायद।  आपने मेरी समस्या को सुलझाने का उपाय बताया था?”

मुझे लगा यह मेरे पीठ थपथपाते जा रहा है, भक्त, चारणभाट बनकर।

आज पुराना ज़माना पहले से ज़्यादा असर लिए लौट आया है। हो भी क्यों न पहले हमारी जनसंख्या कितनी थी? अब तो कई कई गुना बढ़ जो गई है। संख्या के अनुपात में ही सारा कुछ बढ़ गया है। बेरोजगारी, ग़रीबी, अच्छी बातों की कमी और इंसानियत में गिरावट। छोड़िए इन बातों से आप मुझे राजनीति के दलदल में घसीटने लगेंगे। मैं पुराने जमाने के चारण भाटों के बारे में कहना शुरू किया था जिन्हें आजकल नए नाम से पुकारते हैं भक्त या चमचा।

भगवान के सही भक्तों का इससे कुछ लेना देना नहीं है। आज कल चारण भाट या भक्तों की तादाद इतनी ज़्यादा है कि लगभग हर चौथा व्यक्ति भक्त या चमचा है किसी न किसी व्यक्ति (भगवान नहीं) का। कोई नेताओं का भक्त है जो अपने प्रिय नेता (जिन्होंने भले ही इन्हें कभी लाभ न पहुंचाया हो पर सामने वाले को गरियाना है की तर्ज़ पर) पर मक्खी भी बैठने नहीं देता,  तो कोई अपने बॉस का चमचा है, जिससे उसका सीआर अच्छा होगा और रेटिंग पर प्रमोशन मिलेगा। कोई अपने मकान मालिक का भक्त है ताकि किराया न बढ़ाए बार बार, खाली करने को न कहे और मकान मरम्मत समय पर करता रहे तो कोई अपने साथी का चमचा है। साथी का चमचा पारस्परिक चमचों का युगल होता है। 

इससे उसे और उससे इसे थोड़ा बहुत फायदा किसी न किसी रूप में पहुंचता रहता है।  “मैं तेरी थपथपाता हूँ तू मेरी थपथपा – पीठ” वाली तर्ज़ पर खतरनाक सीमा तक एक दूसरे की पीठ थपथपाते हैं निर्लज्जता के साथ कि देखने वालों को तो समझ में आता है पर इस थपथपाई से लाल हो चुकी पीठ के साथ भी असीम अलौकिक आनंद प्राप्त करते रहते हैं। गुरुओं या शिक्षकों या आचार्यों के भक्तों की भक्ति के आगे बड़े बड़े भक्त फ़ेल हैं। आखिर स्नातक, स्नातकोत्तर या शोध जो बिना किसी विघ्न के पूरा करना होता है।

सबसे नाज़ुक हालत होती है कन्या मित्र अजी वही गर्ल फ्रेंड के भक्त की। भले ही वह शूर्पनखा की सगी हो या सुरसा की सिस्टर, भक्त चमचा रूपी प्रेमी उसे रंभा, उर्वशी ही मानकर नित उसकी आरती उतारता रहता है क्योंकि यह बंदा भी तो लगभग वैसा ही होता है। रही बात विवाहित पुरुष की तो वह नौकरी और शादी के बाद इन सारे चमचों यानी भक्तों के प्रतिनिधि के रूप में अपने कर्तव्य का निर्वाह करता रहता है। 

दफ्तर में बॉस, घर पर पत्नी, घर के लिए मकान मालिक, उधार पाने के लिए दोस्त, कभी कभी लिफ्ट के लिए पड़ोसी ये कुछ ऐसे शख्स हैं जिनसे आपको संबंध मधुर बनाए रखना होता है। जी रूढ शब्दों में कहें तो उनका चमचा होना होता है। रीढ़ की हड्डी वाला मानव मेरे बात भले ही न माने लेकिन उनके ऊपरी तले में जो दिमाग है और सीने में जो परेशान दिल है, मेरी  बात माने बिना नहीं रहेंगे।

वैसे गिरधर कविराय ने ज़रूर कुछ लोगों से बैर न लेने को कहा है। गुरु, पंडित, कवि, मित्र, पुत्र, स्त्री, पांवरिया, यज्ञ–कराने वाला, राजमंत्री, पुरोहित, पड़ोसी, वैद्य, रसोइया। इन तेरह लोगों में से हमने कुछ लोगों को कवर किया अपनी बातों में लेकिन मेरा अनुभव कहता है कि जो बचे लोग हैं उनमें अधिकतर दान दक्षिणा, पत्रम पुष्पम तोयम यानी रिश्वत रूपी पैसे देकर उनसे दुश्मनी से बचा जा सकता है। चारण भाट या चमचा या भक्त जैसी कोई बात नहीं, बस अपना काम पूरी नम्रता से निकालना होता है।

वर्तमान में हालत यह है कि अगर आप भीड़ में पत्थर फेंको  तो किसी न किसी भक्त को लगेगा ही। मेरे कहने का मतलब है कि भक्तों कि संख्या निरंतर बढ़ती ही जा रही है। कौन आम आदमी से कब किसी का भक्त हो जाये आपका विधाता भी नहीं बता सकता। कल तक हमारे विधायक को अपने शहर की समस्याओं के लिए गालियां देता मेरा पड़ोसी आज सुबह से उस विधायक के गुणगान करते हुये भक्त बन गया।

 पता चला कि विधायक महोदय ने पड़ोसी के अध्यापक साले साहब का मनचाहे जगह पर प्रमोशन के साथ ट्रान्सफर करवा दिया। अब पड़ोसी मीरा बन कर उस विधायक पर भजन गाना शुरू कर दिया है। यह तो एक उदाहरण है। ऐसे कई कई लोग आपको आस-पड़ोस में मिल जाएँगे। मुझे लगता है कि हमारे देश में परिस्थितियां भक्त, चारणभाट या चमचा  बनाने का काम तेज़ी से और भलीभाँति कर रही हैं।

डॉ0 टी0 महादेव राव

विशाखापटनम (आंध्र प्रदेश)

9394290204