"गुरु-वंदना"

फूलों की खुशबू तुम में है,तुम नदिया की कल-कल।

गुरुवर तुम तो प्रखर सूर्य हो,हरते हो तम हर पल।।


दसों दिशाएँ गाती हैं यश,

मौसम करता वंदन।

देव-असुर सारे आकर के,

करते माथे चंदन।।

तुम तो हो इक नवल चेतना,अंतर का धोते मल।

गुरुवर तुम तो प्रखर सूर्य हो,हरते हो तम हर पल।।


तुम कर्मठता,सत्य-प्रदाता,

शिष्य करें अभिनंदन।

परम शांति हो,ज्ञान-पितामह,

सुरदेवी के नंदन।।

सदा निष्कलुष,पर-उपकारी,हो सच में तुम निश्छल।

गुरुवर तुम तो प्रखर सूर्य हो,हरते हो तम हर पल।।


शिष्य बनें मानव सचमुच में,

बढ़ता उनका यश नित।

मिले राह शिष्यों को चोखी,

संवर्धित होता हित।।

तुम तो हो गुरु आज सुनहरा,लाओगे उज्ज्वल कल।

गुरुवर तुम तो प्रखर सूर्य हो,हरते हो तम हर पल।।


युग-युग से गुरु तुम पूजित हो,

लिए नवल संरचना।

तुम तो ख़ुद ही शिल्पी हो गुरु,

करते मानव-सृजना।।

तुम गुरुवर तूफानों जैसे,शुचिता ज्यों गंगाजल।

गुरुवर तुम तो प्रखर सूर्य हो,हरते हो तम हर पल।।


           --प्रो0(डॉ0)शरद नारायण खरे