ममता का रूप

नारी ने ममता का रूप धारा,

सारा जहान फिर उस पर वारा।

कष्ट उठाए कितने यहांँ,

अपने शरीर में दूजा शरीर धारा।


क्षण क्षण उसको आकार देती,

कभी खाती कभी ना खा पाती।

पच अपच के बीच उलझती

घबराहट हरदम वह सहती।


दिन दिन रूप बदलता है उसका,

पूर्णिमा के चांँद सा बढता।

सब उपमान कम है देखो,

घने वृक्ष सा प्यार है लगता।


मां की ममता की अथक कहानी,

सबने देखो खूब बखानी।

नौ दस मास गर्भ में रखती,

हर दिन धीरे-धीरे गलती।


प्रसव पीड़ा का दुख वह सहती,

सहस्त्र हड्डियो सी पीड़ा होती ।

पुनर्जन्म बच्चे के साथ में होता,

उस ममता का क्या है कहना।


सारा जहां नतमस्तक होता

जो ना समझे उस पीड़ा को

वह तो बस यह कह उठता ,

तुमने कौन सा अलग किया है


समझो जरा उसके हालात

कह ना पाए किसी से बात।

मां वह बनी है देखो यहांँ

है यह देखो गौरव की बात।


पर पिता तो तुम भी बने जनाब,

तुम तो समझो उसकी बात ।

मात-पिता का है यह प्यार,

तभी चलता देखो संसार।


           रचनाकार ✍️

           मधु अरोरा