इक पिता पर ही उठाता आजकल एक बेटा हाथ खंज़र देख लो

बनते दुश्मन अपने अक्सर देख लो

फिर चुभोते दिल में नश्तर देख लो


आँख हमको ही दिखाते मार कर

कैसे-कैसे इनके तेवर देख लो


क्या मुहब्बत जान लोगे तुम अगर

अश्क़ का गहरा समंदर देख लो


किस तरह करवट में बीती रात है

आके मेरा यार बिस्तर देख लो


देखना गर ज़िंदगी को दर-बदर

मुफ़लिसी का एक मंज़र देख लो


इक पिता पर ही उठाता आजकल

एक बेटा हाथ खंज़र देख लो 


या ख़ुदा कलयुग है कैसा आ गया

इक ज़रा जन्नत से आकर देख लो


छोड़ कर घर होटलों में ही पड़े

ऐसे घरवाले भी बेघर देख लो


चाल दौलत की है ये सब और क्या

इसको मुफ़लिस को भी देकर देख लो


प्रज्ञा देवले✍️