मंगलमाया छन्द

    जन  विचार  समवेत, शुभ्र  मानस   सबका।

बनें शुचि  मनहिं  सचेत, तंत्र कौशल कर का।।


समता देशी सोच, सुमति मेल बनाती।

सेवा निःसंकोच, न्याय रीति  सिखाती।।


हुए बहुल बलिदान, संभाग सबहिं मिले।

सबका यह अरमान, जन-जन आनन खिले।।


रोटी शिक्षा स्नेह, भारत-ध्वज के तले।

कोई नहीं अगेह, केसर  गगन  सुफले।।


भागे अंतस-द्वेष,  उज्जवल जनमति रहे।

दूर सकल चित दोष, जनाधार सच कहे।।


त्याग संग अपनत्व, आचार गुण निखरें।

करतब भाव सुमंत, सत्व  तर्क को वरें ।।


सबका  आदर मान,  सबके ही सुघर सजें।

ध्वज तल देशी  गीत, देश युवा जन सिरजें।।


प्रश्न हो सबके हल, द्वंद्व बने मित्रता।

जीव पौध मन मोद,दूर रहे वैरता। ।


भोग वृत्ति का अल्प,  हमें  अब वरना  है ।

कर्म प्रधान विधान,  हृदय में भरना है।।


@ मीरा  भारती,

  पटना, बिहार।