सेक्स वर्कर

दो स्त्रियों के बीच सेक्स वर्कर को लेकर कुछ यूँ बहस चल रही थी... 

–        वैसे सेक्स वर्करों को अपने काम पर पछतावा करना चाहिए कि नहीं?

–        बिल्कुल नहीं करना चाहिए।  

–        वह क्यों?

–        वह देह जरूर बेचती हैं, लेकिन देश कतई नहीं। यहाँ तो देश को सूखे में ढकेलकर खुद अमीर होने वालों की कमी थोड़े न है। भैंस के नाम पर चारा आदमी खा जाता है। बदले में दूध की एक बूँद नहीं देता। चारों तरफ महंगाई की मार से गरीब की रीढ़ की हड्डी टूटती है तो मीडिया वाले अपने आलाकमान की खुशामदीद में उस रीढ़ की हड्डी के टूटने तो खुमार कहते हैं। गरीब की अर्थी पर स्वार्थी बैठकर कर वसूल लेते हैं और कोठियाँ खड़ा कर देते हैं। जिस्म बेचने वाली मुँह काला करती है तो एक बार के लिए उसको शर्म आती है लेकिन कुछ लोग देश का मुँह काला करने के बाद भी बेशर्मों की तरह बेखौफ हमारे-तुम्हारे बीच घूमते रहते हैं। क्या तुम इसे सही कर सकती हो? यदि हाँ तो सेक्स वर्कर अपने आप सुधर जायेंगी।  

–        मैं क्यों सही करूँ? मैं पढ़ी-लिखी हूँ। यह मेरा काम नहीं है। मुझे भविष्य में नौकरी करना है। शादी करनी है। पति के साथ हनीमून पर जाना है। गोवा का बीच देखना है। जूही चौपाटी पर चाट खाना है। बच्चे बैदा करना है। उन्हें पढ़ाना-लिखाना है। उन्हें सुनहरा भविष्य देना है। मैं क्या तुम्हें सावित्री बाई फूले, राजा राम मोहन राय की नवासी लगती हूँ? मैं भला क्यों किसी को सही करने लगी।

जब तुम यह सब नहीं कर सकती तुम्हें कोई हक़ नहीं कि तुम किसी की मजबूरी जाने बिना उस पर मनचाही कमेंट करो। जिंदगी सपनों में हसीन हो सकती है, क्योंकि ये अपने होते हैं और इसे हम अपने हिसाब से देखते हैं। वास्तविकता में जिंदगी परिस्थितियों के हिसाब से चलती है और इस पर हमारे नियंत्रण से ज्यादा बाहरी दखल होता है।

डॉ. सुरेश कुमार मिश्रा ‘उरतृप्त’, मो. नं. 73 8657 8657