कभी -कभी

कभी -कभी 

यूँ ही बेवजह,

मुझसे ढेर सारी बाते किया करो ना,

यूँ हर समय व्यस्त मत रहा करो ना।

कभी -कभी

यूँ ही बेवजह

मुझे लंबी सैर कराया करो ना,

यूँ हर समय काम का गीत मत गाया करो ना।

कभी -कभी

यूँ ही बेवजह

मेरी अलकों को उलझाया करो ना,

यूँ हर समय दोस्तों में मत उलझा करो ना।

काम तुम भी करते हो,

काम मैं भी करती हूँ।

थकते तुम भी हो,

थकती मैं भी हूँ।

तो छोड़ पुरुषत्व के अहम को,

कभी -कभी

मेरे काम को भी मान दे दिया करो ना।

कभी- कभी

यूँ ही बेवजह........।


गरिमा राकेश गौतम 'गर्विता'

कोटा राजस्थान