बीजेपी ही नही हर बड़े दल को नए प्रदेश अध्यक्ष की जरूरत

नगर निकाय चुनाव सिर पर, लोकसभा के लिए भी समय ज्यादा शेष नही

लखनऊ। उत्तर प्रदेश में विधानसभा का चुनाव  हुए 05 माह से ज्यादा का वक्त हो चुका है लेकिन उसके बावजूद प्रदेश की सत्ताधारी पार्टी भाजपा, कांग्रेस अभी तक अपना नया प्रदेश अध्यक्ष नई तलाश सकी हैं। सपा में तो वैकेंसी नही है मगर जिस तरह से ज्यादातर ओहदे खाली हैं, उससे लगता है कि अखिलेश यादव बड़ा बदलाव भी कर सकते हैं। दो पार्टियां उत्तर प्रदेश में बिना प्रदेश अध्यक्ष के काम कर रही हैं, जबकि नगर पालिका चुनाव होने को है। 2024 में होने वाले लोकसभा चुनाव भी ज्यादा दूर नहीं हैं।

 कल बीजेपी के महामंत्री संगठन धर्मपाल ने तो राजधानी में अपनी आमद दर्ज कराकर मिशन फतह 2024 की तैयारियों को लेकर पार्टी वर्करों को अलर्ट कर दिया है, क्योंकि अबकी बार बीजेपी प्रदेश की सभी 80 सीटों पर भगवा लहराने को बेताब है। उपचुनाव में आजमगढ़ और रामपुर लोकसभा सीटे जो प्रमुख विपक्षी दल समाजवादी पार्टी से छीनी है। यह सपा के अभेद्य किले माने जाते थे। 

इन किलो को तोड़कर बीजेपी ने अपना मनोबल ज्यादा बढ़ा लिया है। बावजूद इसके अभी तक नया प्रदेश अध्यक्ष नही तलाश पाई है बीजेपी। भाजपा में नए प्रदेश अध्यक्ष की तलाश कई दिनों से जारी है। घूम फिरकर सुई केशव प्रसाद मौर्य पर आ टिकती है। केशव प्रसाद मौर्य ने उत्तर प्रदेश में सपा से छीनकर सत्ता भाजपा की झोली में डालने का काम करके दिखाया था जो पार्टी भूल नही सकती।

 अनुमान है कि डिप्टी सीएम केशव प्रसाद मौर्या भाजपा के नए प्रदेश अध्यक्ष हो सकते हैं, जबकि समाजवादी पार्टी की बात करें तो अखिलेश यादव के राष्ट्रीय अध्यक्ष के पद को छोड़कर पार्टी की सभी इकाइयों को पिछले माह ही भंग किया जा चुका है। पार्टी सदस्यता अभियान चला रही है। समाजवादी पार्टी में प्रदेश अध्यक्ष के पद का उतना महत्व नहीं है, जितना कि भाजपा या कांग्रेस में है क्योंकि समाजवादी पार्टी में फैसले राष्ट्रीय अध्यक्ष अखिलेश यादव ही लेते हैं लेकिन लोगों की दिलचस्पी इसमें है कि समाजवादी पार्टी नरेश उत्तम को बरकरार रखती है या किसी नए चेहरे को प्रदेश अध्यक्ष बनाती है। 

विधानसभा चुनाव में कांग्रेस भी अजय कुमार लल्लू के नेतृत्व में मैदान में उतरी थी लेकिन लल्लू भी चुनाव हार गए हैं ।कांग्रेस भी चुनाव बुरी तरह से हार गई। अजय कुमार लल्लू ने प्रदेश अध्यक्ष के पद से इस्तीफा दे दिया । चुनाव के बाद से अब तक कांग्रेस अपना नया अध्यक्ष नहीं तलाश पाई है। नगर निकाय चुनाव में राजनीतिक दलों को दिलचस्पी ज्यादा होती है क्योंकि इनके रिजल्ट लोकसभा और विधानसभा चुनाव में काफी असर डालते हैं। जब सभासद ज्यादा जीतेंगे और पालिका अध्यक्ष और मेयर ज्यादा जीतेंगे तो पार्टी को संसदीय और असेम्बली इलेक्शन में मदद मिलेगी।