पंछी मन की बेड़ियाँ

पंछी मन की बेड़ियाँ

कहाँ कभी खुल पाती हैं

असाधारण सी होती है ये बेड़ियाँ

बंधी होती है मन से

जैसे हाथों से हथकड़ियां...


सख्त नियम, जिम्मेदारी, अनुशासन

हालातों को संभाले और

कभी-कभी दूसरों के मन को

रखते - रखते बंधने लगती हैं

स्वयं ही अनायास...


पंछी मन, बेड़ियों में जकड़ा

उड़ता है फिर भी

कल्पनाओं के पंख लगाकर

हर रोज दूर तलक...


कभी आकाश, कभी धरा

कभी पर्वत, कभी नगर

गांव, खेत - खलिहान

बाग - बगीचे, झरने और मैदान

तारामंडल के उस पार भी

तन की पहुंच से कहीं परे...


पंछी मन स्वतंत्र होता है

पूर्णरूप से बेड़ियों में बंध कर भी....


-वंदना अग्रवाल 'निराली' (स्वरचित)

लखनऊ, उत्तर प्रदेश