वो राह ही क्या जहाँ कंटक नहीं

वो राह ही क्या जहाँ कंटक नहीं,

चाँदी की चम्मच से कब

उदर क्षुधा  मिटती है?

वो जीवन ही क्या जहाँ 

अनुभव क्षण भर नहीं।


सीधी समतल सी तटिनी

सूख जाती है पथ पर,

न हो बढ़ने का हुनर तो

मुरझा जाता है सिंचित तरुवर।

सिंधु हुंकार लिए सदा है लहराता,

गर्जना से अपनी सबको डराता।

स्वयं को प्रमाणित करना है जीवन,

वो जीवन ही क्या जिसमें 

पारावार की लहर नहीं!


स्वयं की शक्ति को

तू अब ले पहचान,

उठा असि,तोड़ कुंठा,

कर राष्ट्र का नवनिर्माण,

अथाह ताल की ले अवगाह,

जान ले जीवन की थाह।

एक बूँद से तृषा मिटाकर 

क्यों आगे तू बढ़ रहा?

हाथ बढ़ा,विशाल

पयोधि से माँग ला सुधा।

दायरों की दीवार को लांघकर

अपरिमित पँख फैला,

वो जीवन ही क्या जिसमें 

इच्छाओं का अंबर नहीं...


             रीमा सिन्हा (लखनऊ)