समाज (चंचरीक छंद )

रिश्तों पर करो नाज, बने प्रेम का समाज,

सर्व धर्म कर्म काज,सुभग भाव भरिये |

प्रेम जगत सार जान, सुरभित स्वर भक्ति गान,

हर कोई हो समान, ध्यान हृदय धरिये ||

बैर करे हृदय घाव,रखे नहीं भेद भाव,

बढ़े सुभग प्रेम भाव, उत्सव मिल करिये |

सतत कर्म योग सार, भावना भरे अपार,

समाज ही धर्म धार, ईश्वर मन रहिये ||

आत्मबोध करो आज, खोल दो सारे राज,

वाणी हो अब इलाज, प्यार रंग भरिये |

प्रेम राग गीत सार, जोड़ना दिल के तार,

करो सदा जिन्हें प्यार, सदा संग रहिये ||

रहे समाज में प्यार, बने शिक्षा आधार,

चले न्याय मार्ग धार, धर्म श्रेष्ठ करिये |

उर विचार करें आज, हमसे ही है समाज,

सबपर हो सदा नाज, सत्य राह चलिए ||

मिलजुल कर रहो साथ, हाथों में लेकर हाथ

ईश चरण झुके माथ , ह्रदय प्रेम रखिये |

सबकी फिर मान जीत, त्याग दो सभी कुरीति,

प्रेम ज्ञान और रीति,ह्रदय भाव लखिये ||

___________________________

कवयित्री

कल्पना भदौरिया "स्वप्निल "

लखनऊ

उत्तरप्रदेश