इमाम हुसैन ने परिवार सहित कुर्बानी देकर दीन को बचाया

लखनऊ। इस्लामिक कैलेंडर के अनुसार इस्लामिक हिजरी साल की शुरुआत मोहर्रम के महीने से होती है। हिजरी से मतलब जब रसूले खुदा स.अ.व.इस महीने में मक्के से मदीना हिजरत की यानी (सफर) किया और इसी महीने में पैगंबर-ए-इस्लाम हजरत मोहम्मद के नवासे हजरत इमाम हुसैन को उनको उनके परिवार एवं 72, साथियों सहित भूका प्यासा कुरुर शासक यजीद की फौज द्वारा बहुत बे रहमी से कत्ल करा दिया गया।

 वाकीया कर्बला कुरुर शासक यजीद की फौज द्वारा इमाम हुसैन से बैअत की मांग करने और इमाम हुसैन द्वारा इंकार किये जाने के बाद पेश आया। मोहर्रम में मुसलमान हजरत इमाम हुसैन की इसी कुर्बानी और शहादत को याद करते हैं। हजरत इमाम हुसैन का रौजा इराक के शहर कर्बला में उसी जगह है जहां ये वाकिया पेश आया. ये जगह इराक की राजधानी बगदाद से करीब 120 किलोमीटर दूर है और बेहद सम्मानित स्थान है। 

मुहर्रम के महीने में दसवें दिन ही दीने मुहम्मदी की रक्षा के लिए हजरत इमाम हुसैन ने अपने परिवार सहित कुर्बान कर दिया। इसी दिन को अरबी में यौमे आशूरा भी कहा जाता है। शिया मुसलमान यकुम मुहर्रम यानी मुहर्रम की पहली तारीख से 8, रबिउल अव्वल तक इमामबाड़ों में मजलिसो मातम कर सोग मनाते हैं और मुहर्रम की 10, तारीख से लेकर 8, रबीउल अव्वल तक अलम ताजिया निकालते हैं। भारत ही नहीं पूरे विश्व में मोहर्रम में शिया मुसलमान मजलिस ओ मातम करते हैं यह सिलसिला दो महीना आठ दिन तक जारी रहता है। लेकिन लखनऊ अजादारी का मरकज कहा जाता है। 

यहाँ के नवाबों ने शहर में बड़ी तादाद में इमामबाड़ों का निर्माण करवाया था। मीर अनीस, जिन्होंने अपने मरसियों में विस्तार से वाकिया कर्बला को नज्म की शक्ल में पेश किया है। जिसे आज भी तमाम सोज खान गमगीन आवाज से मजालिसों में पढ़ते हैं। जिस से लोगों की आँखें नम होती हैं। पुरुष, नौजवान,महिलाएं एवं बच्चे फुट फुट कर रोते हैं। मर्द, जवान लड़के कमा जनजीर का मातम कर खुद को लहू लुहान कर लेते है।