कृष्ण क्षणिकाएँ

कृष्ण मन मेरा,

कृष्ण तन मेरा

कृष्ण में ही बसा

अंतर्मन मेरा।


वो अगोचर, अव्यक्त

मेरा प्रेम हैं।

इस नश्वर जगत से

तनिक न मोह हैं।


एक ही मन मेरा

जो कृष्ण में रम गया,

चींटी के गुड़ सा

मुझे उससे नेह हो गया।


गिनती नही होगी मेरी

मीरा या राधा में,

प्रतीक्षित प्रेम मेरा

शबरी सा हो गया।


गरिमा राकेश गौतम 'गर्विता'

कोटा, राजस्थान