गुमान मुझे इस बात का है..

कि कैद रहे घरों में ही, वाकई मसला ये बड़ी बात का है

सुन, ये तेरे ही तो करम हैं ,गुरूर तुझे किस बात का है !!


किस काम की है ये शोहरत..किस काम की ये दौलत..

बचा सका न अपनों को ही, घमंड तुझे किस बात का है !!


जब उगा लिए हमने बगैर ही सोचें ,कंक्रीट के ये घने जंगल

तरस रहे सांसों को भी अब ,अहंकार हमें किस बात का है !!


बना दिया मखौल हमने, धर्म और मजहबों का हर जगह

कहो ये इंसानियत कैसी, अभिमान हमें किस बात का है !!


हां, रोप देती हूं रोज मैं , पौध नन्हीं नन्हीं कविताओं की यहां

"मनसी", फिज़ा बदलेगी ज़रूर, गुमान मुझे इस बात का है !!


नमिता गुप्ता "मनसी"

मेरठ , उत्तर प्रदेश