डिजिटल दुनियां

दिखने में लागे ललमुनिया,

आभासी ये डिजिटल दुनियां।

अजनबी बन रहे हैं अपने,

अपने बन जाते हैं ग़ैर।

सिमट गये जज़्बात भी मोबाइल में,

हकीक़त से हो रहा है बैर।

चैटिंग, नोटिफिकेशन की बजती घण्टियां,

आभासी ये डिजिटल दुनियां...

माना बहुत कुछ आसान हुआ,

ऑनलाइन पढ़ना लिखना साकार हुआ।

पर अपनापन ना जाने खो गया कहाँ,

कृत्रिमता की चादर से आच्छादित हुआ जहां।

सुकून गयी रातों की,दिन है बोझिल ओढ़निया,

आभासी ये डिजिटल दुनिया...

इक घर में रहकर भी बन गये सब पराये हैं,

सबकी अपनी डफली सब अपनी धुनि रमाये हैं।

जन्मदिन,हो या त्योहार सब डिजिटल मनाते  हैं,

शुभकामनाएँ देते 'सोशल साईट' मिलना  भुलाये हैं।

मिथ्या नुपुर झंकार से झंकृत है ये पैजनिया,

आभासी ये डिजिटल दुनिया...


                  रीमा सिन्हा (लखनऊ)