अतीत की याद

अतीत की यादों में खोई थी,

न जाने तब जागी या सोई थी।

चहुँ ओर वहाँ खुशियां ही थीं,

मुक्ताहल बन हँसी पिरोई थी।

काँधों पर झूलता वो बचपन,

खेल-खिलौने न कोई अनबन।

कुछ दिनों बाद बस्तों का भार,

मस्ती पढ़ाई सखियों का प्यार।

हँसते खेलते बीत गये वो दिन,

ज़िम्मेदारियों में दब गये पलछिन।

आँखों में काले घेरे,बालों में चांदी,

फाल्गुन भी न लगता अब उन्मादी।

शांत क्रिया और प्रतिकिया है होती,

स्वच्छंद हँसी न होठों पर है सजती।

याद आती है वह बात पुरानी,

जब बनती थी मैं माँ की नानी।

पूछती थी मैं  हज़ारों सवाल ,

क्यों रहना न आता खुशहाल?

सोचती थी मैं जिंदादिल रहूँगी,

कभी किसी की नहीं सहूँगी।

पर अब समझ में आयी वो बात,

क्यों माँ करती दुख को आत्मसात?

जीवन जिंदादिली नहीं शायद

ज़िम्मेदारियों  का है नाम।

उन्हीं पलों से सहेजकर खुशियां,

बढ़ते जाना है मनुज का काम।


                     रीमा सिन्हा

                लखनऊ-उत्तर प्रदेश