"उपभोक्तावादी संस्कृति से संकट में पर्यावरण"

पर्यावरण संरक्षण का मुद्दा किसी व्यक्ति समाज व देश से संबंधित ना होकर संपूर्ण मानव जाति से हैं ,मानव का अस्तित्व ही प्रकृति के अस्तित्व पर निर्भर करता है !लेकिन औद्योगिक क्रांति के बाद उपभोक्तावाद और दिखावे की संस्कृति ने प्रकृति की उपेक्षा करते हुए विकसित देश अपने स्वार्थ को सिद्ध करने में लगी हुये हैं, जिसका दुष्परिणाम संपूर्ण विश्व को ग्लोबल वार्मिंग  इत्यादि तरह के वैश्विक संकट के रूप में भुगतना पड़ रहा है!  इसी क्रम में दैनिक जीवन से संबंधित सिंगल यूज़ प्लास्टिक  एक बड़ा मुद्दा है जो दैनिक जीवन के उपयोग से तुरंत ही कूड़े के ढेर या गंदगी के रूप में प्रकृति को प्रभावित करता है!

  इसलिए प्रधानमंत्री जी ने इसे चरणबद्ध तरीके से रोकने के लिए 19 वस्तुओं के निर्माण भंडारा आयात, वितरण, बिक्री और उपयोग पर पूरी तरह प्रतिबंध लगा दिया! इसमें अधिकतम उन वस्तुओं पर प्रतिबंध है जो सस्ती होने की वजह से बहुतायत रूप में उपयोग होती हैं जैसे प्लास्टिक के पाइप, ईयरबड ,कैंडी ,गुब्बारे तथा पैकेजिंग फिल्म आदि यह प्रतिबंध जहां एक ओर लोगों के दिखावे की संस्कृति के रूप में थोड़ा हस्तक्षेप करेंगे तो वहीं दूसरी ओर लोगों को होने वाले दूरगामी नुकसान से बचाव भी करेंगे । 

इन प्रतिबंधों से कूड़े से थोड़ा निजात मिलेगी! देश की राजधानी दिल्ली में ऐसी तीन जगह हैं जहां इतना कूड़ा जमा है कि दूर से देखने पर वह किसी पहाड़ की तरह लगता है यह कोई हमारी उपलब्धि नहीं बल्कि कचरा निष्पादन के प्रति हमारी अनदेखी और उदासीनता का दुष्परिणाम है! सिर्फ प्रतिबंध लगा देना ही एक समाधान नहीं है जहां एक ओर भारत में चरम बेरोजगारी है तो ऐसे में इन प्रतिबंधों से उन सभी कामगारों के रोजगार पर सीधा असर पड़ेगा जो इससे प्रत्यक्ष व अप्रत्यक्ष रूप से जुड़े हैं! 

इससे 60 हजार से अधिक प्रसंस्करण इकाई व 40 लाख कामगार जुड़े हैं, ऐसे में सवाल उठता है कि इन कामगारों की जीविका का क्या होगा इसलिए इस रोजगार संकट से निपटने के लिए प्लास्टिक निर्माण उद्योगों को जूट उत्पादन और थैलियों के निर्माण कार्य में प्रतिस्थापित करने की सरकार की नीति है जिससे जहां एक और रोजगार का संकट का समाधान होगा तो वहीं दूसरी ओर जूट की मांग बढ़ने से जूठ उत्पादकों को फायदा होगा! 

वर्तमान की उपभोक्तावादी संस्कृति को लोगों को बदलने की जरूरत है क्योंकि सिंगल यूज प्लास्टिक बढ़ने के दो कारण हैं एक उपभोक्तावाद दूसरा प्लास्टिक उत्पादों की कीमत का कम होना , उदाहरणार्थ- कांच की बोतल प्लास्टिक की बोतल से सस्ती है तो स्वाभाविक रूप से कंपनियां प्लास्टिक की बोतल का उपयोग करेंगीं! सरकार ने बढ़ती उपभोक्तावाद की संस्कृति के खतरों का अनुमान लगाते हुए अब प्लास्टिक पर कड़ा कदम उठाने में लगी है एक ओर तो ऐसे बैग व अन्य प्लास्टिक सामान पर रोक लगा रही है जिनका उपयोग सिर्फ एक बार होता है तो वहीं दूसरी ओर रिसाइकल के  किए जाने वाले बैग बनाने के लिए कदम उठा रही है जिससे कूड़े से निजात मिले!

 जूट की थैलियां तथा अन्य वस्तुओं के निर्माण पर जोर देना होगा जो पूरी तरह पर्यावरण अनुकूल है सरकार के यह सभी कदम पर्यावरण संरक्षण के प्रति अत्यंत सराहनीय है , लेकिन सिर्फ सरकार के प्रयास से ही पर्यावरण संरक्षण संभव नहीं है हर नागरिक को व्यक्तिगत रुप से इस मुहिम में जुड़ना होगा ! मनुष्य ने उपभोक्तावाद के चक्कर में पर्यावरण के प्रति उदासीनता का त्याग करना बहुत  जरूरी हो गया है क्योंकि मनुष्य ने प्रकृति से हर तरह से छेड़छाड़ कर उसे अपने फायदे के लिए दो रूपांतरित करने की कोशिश की , जिसका दुष्परिणाम कभी बाढ़, कभी सूखा, कभी भूस्खलन के रूप में भुगतना पड़ता है जिस पर अगर लगाम ना लगी तो भविष्य के मानवीय अस्तित्व प्रकृति के विनाशिता के साथ खत्म हो जायेगा! 

 सिंगल यूज प्लास्टिक एक बार उपयोग के बाद सिर्फ कूड़े के ढेर में बदल जाती है जो ना सिर्फ एक गंदगी बढ़ाती है बल्कि मनुष्य को विभिन्न रोगों से ग्रसित करती है! मनुष्य के शरीर में प्रतिवर्ष 82 हजार कण अंदर प्रवेश करते हैं जो किसी न किसी रोग को उत्पन्न करते हैं! रंग बिरंगे उपहार खिलौने आकर्षक पॉलिथीन में पैक कराकर गिफ्ट कार्ड यह सब क्षणिक सुख के लिए भविष्य खतरे में जा रहा है यह संकट सिर्फ भारत का ही नहीं है बल्कि और भी 40 देश इस समस्या से ग्रसित हैं भारत में प्रतिदिन 26 हजार टन प्लास्टिक उत्पादन होता है !

और सिर्फ एक बार के उपयोग के बाद कूड़े के ढेर में बदल जाता है इस तरह हर शहर हर जगह में कूड़े के ढेर का साम्राज्य बनता जा रहा है जिसे नागरिक स्वयं से विचार कर अपनी आदतों पर प्रतिबंध लगाएं! लेकिन नागरिक स्वयं से ऐसा नहीं करते इसलिए सरकार को विवश होकर ऐसे प्रतिबंध मानव के भविष्य हित को ध्यान में रखते हुए लगाने पड़ रहे हैं! इस विकासवाद के युग में प्रकृति विरोधी कारणों से हम आर्थिक समृद्धि तो दे सकते हैं लेकिन धारणीय विकास कभी नहीं और इस तरह मनुष्य विनाश की ओर जाएगा इसलिए हमें उपभोक्तावाद और दिखावे की संस्कृति को छोड़कर अपनी महत्वाकांक्षा त्यागकर सतत विकास के लिए सिंगल यूज प्लास्टिक का उपयोग बंद करना चाहिए

पर्यावरण संरक्षण में सिंगल यूज प्लास्टिक एक गंभीर मुद्दा है अतः इसके साथ ही अन्य मुद्दों पर भविष्य और अस्तित्व संकट से बचने के लिए ना सिर्फ सरकारी और वैश्विक स्तर पर बल्कि व्यक्तिगत स्तर पर हमें स्वयं के भविष्य की चिंता करते हुए प्रयास करना होगा क्योंकि अच्छा पर्यावरण ही अच्छे स्वस्थ जीवन का आधार है अतः हम सबको सिंगल यूज प्लास्टिक को त्यागने तथा व्यक्तिगत स्तर पर हर संभव प्रकृति संरक्षण करने की प्रतिज्ञा लेना होगी ! 

मधुर गुप्ता PCS 

(उप जिलाधिकारी) 

बरेली , उत्तर प्रदेश