स्वामी तुरीयानन्द महाराज का 147वां अवतरण दिवस श्रद्धापूर्वक मनाया

सहारनपुर। मण्डी समिति कृष्णा नगर स्थित सिद्धपीठ स्वामी तुरीयानन्द सत्संग सेवा आश्रम में आध्य सतगुरू श्री श्री 1008 स्वामी तुरीयानन्द जी महाराज का 147वां अवतरण दिवस बड़े हर्षोल्लास एवं श्रद्धा से मनाया गया। गद्दीनशीन श्री श्री 1008 स्वामी विवेकानन्द गिरि जी महाराज ने संगत पर अमृत वर्षा करते हुए अपने प्रवचनों में बताया कि मर्यादा का शाब्दिक अर्थ है सीमा, लेकिन शास्त्रों में इस शब्द का अर्थ है ‘‘ परम्परा द्वारा निर्धारित नियमों का पालन करना’’ अर्थात व्यवहार की स्वीकार्य सीमा।

 अतः मर्यादा जुड़ी है सम्बन्धों से, परिस्थिति से, सामाजिक व्यवहार से। भारतीय परम्परा में मर्यादा के निर्वाह की बड़ी महिमा हमारे आराध्य, त्रेता युग में विष्णु के अवतार भगवान राम को मर्यादा पुरूषोत्तम कहकर सम्मानित किया गया है। यानि के जो पुरूषों मे सबसे उत्तम हो। उन्होंने कुल व सम्बन्धों की मर्यादाओं का अनुपालन किया और उन्हें अखंडित बनाये रखा। इसलिए वे पुरूषों में उत्तम माने गये हैं।

श्री महाराज ने कहा कि यदि संसार को विनाश से बचाना है तथा उत्तरजीवी बने रहना है तो यह अनिवार्य है कि कोई भी वस्तु चाहे वह छोटी हो या बड़ी, मर्यादा को किसी भी स्थिति में न भूलें सांसारिक व्यवस्थाओं का आधार है समाज, समुदाय एवं संस्कृति और इन सभी की मूल इकाई है व्यक्ति अथवा मनुष्य, चूंकि ये सभी व्यवस्थाएं अर्मूत हैं, जबकि व्यक्ति इनका मूर्त प्रतीक है, जिसकी गतिविधियों एवं व्यवहार से व्यवस्थाएं अपना अस्तित्व पाती हैं, एवं लगातार आगे बढ़ती है। व्यक्ति से अपेक्षा की जताी है कि वह समाज द्वारा निर्धारित मर्यादाओं के अनुरूप ही अपने आचरण को ढ़ाले। 

यदि वह ऐसा नहीं करता तो इसे समाज के अहित में माना जाना चाहिए तथा समाज व प्रकृति व्यक्ति को दण्डित करता है। इस महान धार्मिक समारोह में देश के कई प्रान्तों से आयी विशाल संगत ने बड़ी श्रद्धापूर्वक भाग लेकर धर्मलाभ उठाया और प्रत्येक दिन अल्पाहार व भण्डारे का आयोजन भी किया गया। महाराज जी ने समस्त संगत, ट्रस्ट व शहर के उपस्थित गणमान्य नागरिकों को आशीर्वाद देकर प्रसाद वितरण के पश्चात स्वामी तुरीयानन्द ट्रस्ट के सभी सदस्यों द्वारा संगत का तन-मन व धन से सहयोग हेतु आभार प्रकट कर धन्यवाद दिया।