विपक्षी कौआ सत्ता में कोयल कहलाए

पोता नई नवेली सत्ता का गुणगान ऐसे करता जैसे उसकी नौकरी लग गई हो। आए दिन अपने दद्दू को उनके जमाने की सरकार का मजाक उड़ाने का एक भी अवसर नहीं गंवाता। एक दिन दद्दू ने पोते से कहा - जब सत्ता का तूफान चलता है तब महावृक्ष कहलाने वाले विपक्षी नेता भी धराशायी हो जाते हैं। सब समय-समय का फेर है। एक दौर वह भी था, एक दौर यह भी है। कब भेड़ शेर की खाल ओढ़ ले और शेर भेड़ की, कुछ कहा नहीं जा सकता। मुझे तो समझ ही नहीं आता कि वो नेता कैसे होंगे जिनसे सत्ता पक्ष ज्वाइन नहीं किया जाता। ऐसे नेताओं को इक्कीस तोपों की सलामी दी जानी चाहिए। मांसाहारियों के बीच निरीह बकरी का बच पाना उतना ही कठिन है जितना कि आंधी में दिये का जलना। न जाने कैसे ईडी, सीबीआई और इनकम टैक्स से स्वयं को फटने से बचा पा रहे हैं! समझदारी इसी में है कि विपक्ष के कीचड़ में नहाओ और सत्ता की नदी में स्वच्छ हो जाओ। एक पंथ दो काज। इधर कीचड़ भी साफ उधर स्वच्छ भारत का अभियान भी।  

दद्दू आप कहना क्या चाहते हैं, साफ-साफ तो समझाइए – पोते ने अनुभवी दद्दू के सामने विस्मय भरा सवाल रखा। दद्दू ने कहा – बेटा राजनीति दाल-भात का कौर तो है नहीं कि उठाया और मुँह में डाल लिया। यह तो जिंदा मक्खी निगलने से भी जितना मुश्किल काम है। आजकल सत्ता ढीठ परायों को अपना बनाने के लिए तरह-तरह के हथकंडे अपना रही है।

जनता को विपक्षियों के खिलाफ इतना भड़का दो कि विपक्ष भलाई कहे तो जनता को लड़ाई सुनाई दे। अपने हाथ खराब करने से अच्छा जनता को जनता के द्वारा जनता के लिए धोखा देना ही असली प्रजातंत्र है। सत्ता पक्ष ने परोक्ष रूप से यह घोषणा कर दी है कि देश की युवा पीढ़ी लाख उन्माद करे, रेल जला दे, लेकिन बस एक बार विपक्ष को उसका कारक बता दे, उनके सारे पाप धूल जायेंगे।

सत्ता तो चाहती है कि माँ ऐसे बच्चे पैदा करे जो जन्म लेने के साथ खराब को अच्छा और अच्छे को खराब बताए। और तो और पूरी दुनिया से भी कहे कि सत्ता के बिना पत्ता भी नहीं हिलता। इसलिए पौधों को पानी डालने की बजाय सत्ता को विपक्षियों की खाद बनाकर पलने-बढ़ने का अवसर देना चाहिए। यही हमारा लक्ष्य बनना चाहिए। उन लाखों नौजवानों को सत्ता की जय बोलना चाहिए जिसके हाथ में डिग्री तो है पर नौकरी नहीं है। जो बिना नौकरी आत्महत्या करने को तैयार हैं। अरे भई विपक्षियों को धूल चटाओ, नौकरी की समस्या तो अपने आप दूर हो जाएगी।

किसान जो कभी अन्न उगाते थे, आजकल विपक्षियों की गोद में बैठकर हड़ताल-हड़ताल खेल रहे हैं। न रहेगा बाँस न बजेगी बांसुरी। न रहेगा विपक्ष और न रहेगा किसान।  सत्ता को अपना मानने वाले फिर चाहे  6 माह की बच्ची से बलात्कार करे या फिर 80 वर्षीय औरत से। क्या फर्क पड़ता है बलात्कार के लिए बूढ़ी है या फिर जवान या नन्हीं सी कली। सत्ता पक्ष में ज्वाइन करते ही ईडी, इनकम और सीबीआई जनाना बन जाए और ज्वाइन करने वालों की रखैल। विपक्ष में रहकर सांस लेने वाले को आजीवन कारावास की सजा सुनानी चाहिए। 

डॉ. सुरेश कुमार मिश्रा ‘उरतृप्त’, मो. नं. 73 8657 8657