आओ अनियोजित निर्णय पर ध्यान दें

कानों सुनी तो क्या आंखों देखी पर भी सोच समझकर निर्णय लेना चाहिए 

अनियोजित निर्णय लेते समय, बड़े बुजुर्गों की कहावतों पर गौर करने से विपत्तियों से बचने और लक्ष्यों को प्राप्त करने में सुविधा होती है - एड किशन भावनानी 

गोंदिया - मानव के व्यावहारिक जीवन में अनेक बार ऐसी परिस्थितियां उत्पन्न होती है जहां उस विशेष अनियोजित परिस्थितियों में अचानक ही निर्णय लेने की ज़रूरत होती है बस!! यही वह समय होता है जब अपनी बुद्धि कौशलता के साथ हमें बड़े बुजुर्गों द्वारा कही गई कहावतों, मुहावरों, विचारों को रेखांकित करने की अत्यंत तात्कालिक ज़रूरत होती है । 

जिससे हमें अति उच्च गुणवत्ता का सकारात्मक निर्णय लेने में आसानी होती है,जिसके दूरगामी सकारात्मक परिणाम होते हैं और उन परिस्थितियों में पढ़ने वाले विपरीत नुकसान, दुष्परिणामों से बचा जा सकता है जिसके दूरगामी सकारात्मक परिणाम निकलते हैं और हम उसका श्रेय बड़े बुजुर्गों के आशीर्वाद के रूप में ले सकते हैं। 

साथियों बात अगर हमव्यवहारिक जीवन में निर्णय लेने की करें तो यह दो प्रकार का हो सकता है नियोजित और अनियोजित निर्णय, ऐसे निर्णय जो किसी परिस्थिति विशेष पर अकस्मात लेने पड़ते हैं जिसके लिए कोई पूर्व योजना नहीं होती है। अनियोजित निर्णय कहलाते हैं। इसके विपरीत ऐसे निर्णय जो किसी पूर्व येाजना पर आधारित होते हैं, नियोजित निर्णय कहलाते हैं। नियोजित निर्णय ठोस तथ्यों पर आधारित होते हैं क्योंकि यह पूर्व निर्धारित योजनापर आधारित होते हैं। 

साथियों बात अगर हम बड़े बुजुर्गों की कहावतों की करें तो, कहावत उस छोटे से वाक्य या लाइन को कहा जाता है जिसके माध्यम से बड़ी-बड़ी बातें कह दी जाती है। गाँव, घर में अक्सर बड़े-बुजुर्गों के द्वारा बहुत सारी कहावतें सुनने को मिलती है। 

इन कहावतों को स्कूल में नही पढाया जाता है, इसे ज्यादातर ग्रामीण क्षेत्रों के लोग बोलने में प्रयोग करते है। बहुत सारी ऐसी कहावतें होती है जो घर की महिलाओं के द्वारा प्रयोग की जाती है, कई बार गाँव में बड़े बुजुर्गों की कहावत का अर्थ तो पढ़े लिखे लोग भी नहीं निकाल पाते है, और शर्म में हाँ में हाँ मिलाकर आगे बढ़ जाते है। 

साथियों बात अगर हम तुरंत निर्णय लेने वाली परिस्थितियों की करें तो, मानव जीवन में अनेक बार ऐसी परिस्थितियां आती है जब मनुष्य समझ नहीं पाता कि उसे किस तरह उस परिस्थिति का सामना करना है । परिस्थितिवश उत्पन्न स्थिति स्वयंमें इतनी उलझी होती है की अगर सूझ बूझ और दूर दृष्टि का सहारा न लिया जाये तो निर्णय गलत होने की पूरी सम्भावना रहती है ।

अनेको बार छोटी छोटी बातें हमें नकारात्मक गहराई तक प्रभावित करती हैं । ऐसी स्थिति उत्पन्न होने पर बेहतर तो यह है की हम शांति और धैर्य से उस परिस्थिति का विश्लेषण करें तथा उस स्थिति के पक्षविपक्ष दोनों के बारे में सोंचे क्योंकि प्रत्येक स्थिति के दो पहलू होते है , एक अगर सकारात्मक है तो दूसरा नकारात्मक अवश्य होगा ।

 हमें परिस्थिति के गुण दोष के आधार पर निर्णय लेना चाहिए न कि जल्दबाजी में या घबराकर कोई कदम उठाना चाहिए जिससे की हमारे पक्ष में होने वाली बात का भी विपरीत असर हो जाये ।सबसे बड़ी बात हमें किसी भी विपरीत स्थिति में धैर्य , सहनशीलता और शांति से निर्णय लेने की आदत डालनी चाहिए अगर ऐसा हुआ तो हम अपने जीवन में अवश्य सफल होंगे । 

साथियों बात अगर हम कानों सुनी और आंखों देखी पर भी सोच समझकर निर्णय लेने की करें तो,आँखों देखी या कानों से सुनी हर बात सत्य हो, यह आवश्यक नहीं है। हम उस एक ही पक्ष को देखते और सुनते हैं, जो हमें प्रत्यक्ष दिखाई या सुनाई देता है। उसके दूसरे पहलू के विषय में जानकारी न होने के कारण हम कोई विशेष धारणा बना लेते हैं। 

जब हमारा वास्तविकता से सामना होता है तब पश्चाताप करना पड़ता है। अपनी नजरों को झुकाकर क्षमा-याचना करनी पड़ती है। उस दयनीय स्थिति से बचने के लिए मनुष्य को सावधान रहना चाहिए। उसे ऐसा कुछ भी नहीं कहना चाहिए जो उसके तिरस्कार का कारण बन जाए। 

साथियों बात अगर हम परिस्थितियों पर निर्भर सटीक निर्णय लेने की करें तो, आधा-अधूरा ज्ञान सदा ही विध्वंस कारक होता है। जो भी देखें या सुने उसे निकष पर कसें। इससे भी बढ़कर यह जानने का प्रयास करना चाहिए कि हमारी सोच कहाँ तक सही है। 

किसी भी घटना के सारे पहलुओं को जाने बिना कोई धारणा नहीं बनानी चाहिए। इसके अतिरिक्त चटकारे लेकर, मिर्च-मसाला लगाकर दूसरों को अपमानित करने की प्रवृत्ति से बचना चाहिए। ऐसे अफवाहें फैलाने वालों की जब पोल खुल जाती है तो वे कहीं के भी नहीं रह जाते। लोग उन पर विश्वास करना छोड़ देते हैं और उनकी बातों को सीरियसली न लेकर मजाक में उड़ा देते हैं। इसलिए मनुष्य को ऐसी स्थितयों से बचना चाहिए। उसे एक जिम्मेदार मनुष्य बनने का प्रयास करना चाहिए। 

साथियों बात अगर हम परिस्थितियों व निर्णय पर बीरबल और अकबर के सीख वाले किस्से की करें तो उपरोक्त कहावतों को सटीकता से समझने के लिए, मेरे पिताजी द्वारा बताया गया किस्सा जरूर सुनना चाहिए, राजा अक़बर जंगल में शिकार करते हुए रास्ता भटक गए, देर होने के कारण रानी साहिबा ने नौकर को रूम बेड क्लीन का आदेश दिया नौकर नें रूम में मखमली बेड को देखा तो दिल बेड पर एक बार सोने के लिए ललचाया और वह चादर ओढ़ कर सो गया उसे नींद आ गई!!

उधर रानी साहिबा भी अपनी धुन में ही आई और बेड पर राजा आराम फरमा रहे हैं समझकर उन पर हाथ रख कर सो गई। जब देर रात्रि राजा अपने रूम में आया तो किसी और के साथ रानी को सोते देख गुस्से से लाल हुआ और बंदूक निकाल कर दोनों को गोली से उड़ाने ही वाले थे कि उन्हें बीरबल की बात याद आई कि कानों सुनी तो क्या आंखों देखी पर भी विश्वास नहीं करना चाहिए!! 

इसलिए राजा रुक गया और इंतजार किया!! जब रानी और नौकर की नींद टूटी तो दोनों बहुत भौचक्के रह गए और रानी ने नौकर पर चिल्लाया तब नौकर ने माफी मांगी और बेड पर सोने का अपना किस्सा सुनाया कि वह मखमली बेड देखकर वह सोया और रानी ने भी राजा समझ कर बेड पर सोई यह सच्चाई सुनकर राजा ने  कहा बड़े बुजुर्गों की कहावतों के निर्णय नें आज रानी और नौकर की जान बचाई यह समझ में आया और दूसरे दिन बीरबल को बुलाकर पुरस्कृत किया। 

अतः अगर हम उपरोक्त पूरे विवरणका अध्ययन कर उसका विश्लेषण करें तो हम पाएंगे कि आओ अनियोजित निर्णय पर ध्यान दें, कानों सुनीतो क्या आंखों देखी पर भी सोच समझकर निर्णय लेना चाहिए,अनियोजित निर्णय लेते समय बड़े बुजुर्गों की कहावतों पर गौर करने से विपत्तियों से बचने और लक्ष्यों को प्राप्त करने में सुविधा होती है। 

-संकलनकर्ता लेखक - कर विशेषज्ञ स्तंभकार एडवोकेट किशन सनमुखदास भावनानी गोंदिया महाराष्ट्र