नखरे

नखरे वह तो कर रही,

है अलबेली नार।

बात बात पर रूठती।

लड़ने को तैयार।


कभी चाहिए होठों की लाली,

फरमाइश है देखो आली।

कजरे, गजरे में ना वह माने,

नेकलेस ही लेकर जाने।


नखरे करती मांगे  हैं करती,

बेवजह मुझसे है लड़ती।

मायका का हे रौब दिखाती,

मायके जाने को तैयार।


धमकी देती रोज-रोज वह,

महंगाई ने कमर तोड़ दी।

सोने न है बुलंदी छू ली।

कहांँ से दिलवाऊँ नेकलेस ।


सोच सोच कर मैं तो हारा

कमाई मेरी कम हो गई।

जीएसटी की मार से,

जनता देखो परेशान हो रही।।


           रचनाकार ✍️

           मधु अरोरा