गुरू बिन कौन सहाई

गुरू बिन कौन सहाई मेरा,

सारा जगत है मतलब का रे,

चहुँ दिशि छाया घुप्प अंधेरा|

प्रभु  रूठे,गुरू शरण मिली,

गुरू रूठे, चले न कोई फेरा|

गुरू बिन कौन सहाई  मेरा?

चुनि-चुनिअवगुण तन से छाटें,

जिससे मन काअंधियारा भागे|

चम-चम चमके मस्तक मेरा,

घर -आंगन में  चहके  सवेरा|

गुरू बिन  कौन   सहाई मेरा|

बिन गुरू ज्ञान निरर्थक जीवन,

मिले सहारा बढ़े सार्थकतापन|

दीन - हीन जन के सेवक बन,

फैलाएं शिक्षा का नवल उजेरा|

गुरू  बिन  कौन  सहाई  मेरा|

गुरू  की  महिमा  सर्वोपरि  है,

उन  पर  ही  सबकुछ निर्भर है|

फिर क्यों भटक रहा है रे मन,

करके  तू  तू -मैं मैं, तेरा -मेरा|

गुरू  बिन  कौन  सहाई  मेरा|

अनुपम चतुर्वेदी,सन्त कबीर नगर, उ०प्र०