विराट की जगह नये को दें अवसर

भारतीय क्रिकेट में दो बयान सुर्खियों में है. पूर्व कप्तान कपिल देव ने कहा है कि अगर विश्व के नंबर दो गेंदबाज रविचंद्रन अश्विन को टेस्ट टीम से बाहर रखा जा सकता है, तो नंबर एक बल्लेबाज विराट कोहली को भी बाहर किया जा सकता है. अगर कोहली बेहतर प्रदर्शन नहीं कर पा रहे, तो फिर आप सिर्फ उन्हें पुरानी छवि की वजह से टीम में रखकर किसी युवा बल्लेबाज, जो फॉर्म में है, को बाहर नहीं कर सकते. 

दूसरा बयान पूर्व गेंदबाज और बॉलिंग कोच वेंकटेश प्रसाद का है. उन्होंने कहा कि एक दौर था, जब भले ही आप कितने बड़े नाम हों, पर आप खराब फॉर्म में हों, तो आप बाहर हो जाते थे. सौरव, सहवाग, युवराज, जहीर और हरभजन जैसे खिलाड़ी टीम से बाहर हुए, दोबारा घरेलू क्रिकेट में गये और फिर वापसी की. जाहिर तौर पर वेंकटेश प्रसाद का भी इशारा विराट कोहली की ओर था. टीम इंडिया के नेतृत्व ने विराट कोहली का बचाव किया है.

पहले कोच राहुल द्रविड़ ने इंग्लैंड के खिलाफ टेस्ट मैच से पहले ऐसा किया, फिर कप्तान रोहित शर्मा उनका बचाव करते दिखे. रोहित ने तो यहां तक कह दिया कि कपिल देव समेत हर किसी को आलोचना करने का अधिकार है, लेकिन वे चीजों को बाहर से देख रहे हैं, जबकि वे हर चीज को करीब से देखने के बाद सोच-समझकर चयन करते हैं. अहम सवाल यह है कि टीम इंडिया के हित में क्या है. 

रोहित शर्मा और टीम मैनेजमेंट को कोहली के बचाव का पूरा अधिकार है, लेकिन वे इससे इंकार नहीं कर सकते कि इस मुद्दे को ऐसे दो क्रिकेटरों ने उठाया है, जिन्हें मैनेजमेंट का हिस्सा होने और इन चीजों को करीब से देखने का खासा अनुभव रहा है. दुनिया की बड़ी से बड़ी टीम ने फॉर्म में नहीं होने पर अपने बड़े से बड़े खिलाड़ी को बाहर किया है. ऐसे फैसले उस स्टार खिलाड़ी और टीम दोनों के लिए लाभदायक रहे हैं. 

अगर लगातार खराब फॉर्म में चल रहे किसी खिलाड़ी को मौका दिया जाता है, तो इसका खामियाजा पूरी टीम को भुगतना पड़ता है. मिसाल के लिए, पहले टेस्ट चौंपियनशिप साइकल में टीम इंडिया फाइनल में पहुंची, पर मौजूदा साइकल में लगातार हार की वजह से इसकी बहुत ही कम संभावना है कि मौजूदा टीम इंडिया फाइनल तक के सफर को पूरा करेगी.

 हालिया महीने में भारत टेस्ट मैच में अहम मुकाबला खराब फॉर्म में रहे बल्लेबाजों की वजह से हारा है. पहले, खराब फॉर्म के बावजूद अजिंक्य रहाणे और चेतेश्वर पुजारा लगातार खेलते रहे और अब विराट कोहली को मौका दिया जा रहा है. जहां भारतीय गेंदबाजी लगातार धारदार रही, वहीं बल्लेबाजों ने निर्णायक मोड़ पर निराश किया. खराब फॉर्म में चल रहे खिलाड़ी को लगातार मौका देना क्या बेहतर फॉर्म वाले किसी युवा खिलाड़ी के साथ नाइंसाफी नहीं है, जो बाहर है? 

क्या विराट कोहली वे चौंपियन क्रिकेटर बन सकते थे, अगर उन्हें सही वक्त पर मौका नहीं मिलता? किसी भी पेशेवर क्रिकेटर का अंतरराष्ट्रीय क्रिकेट में शिखर फॉर्म सीमित समय के लिए होता है. अगर सूर्य कुमार यादव और दीपक हुड्डा जैसे क्रिकेटर को ऐसे ही लगातार बाहर रखा गया, तो क्या उनके साथ अन्याय नहीं होगा? जहां यह सच है कि आईपीएल दौर के बाद टीम इंडिया में टैलेंट की भरमार है, लेकिन यह भी सच है कि भारत उस टैलेंट का सही इस्तेमाल कर विश्व क्रिकेट में अपनी बादशाहत नहीं जमा सका है. 

भारत ने अपना पिछला टी-20 वर्ल्ड कप 15 साल पहले 2007 में जीता और आखिरी आईसीसी टूर्नामेंट 13 साल पहले चौंपियंस ट्रॉफी के तौर पर जीता था तथा ऑस्ट्रेलिया को ऑस्ट्रेलिया में लगातार दो बार हराने के अलावा इंग्लैंड, दक्षिण अफ्रीका और न्यूजीलैंड को उनके देश में मात नहीं दे सका है. उल्लेखनीय है कि स्टार खिलाड़ी को निकालना इसलिए भी मुश्किल होता है क्योंकि उस पर बाजार का बड़ा पैसा लगा होता है. 

इस अर्थशास्त्र को दूसरे तरीके से समझने की जरूरत है. अगर स्टार खिलाड़ी फॉर्म में न होने के बावजूद लगातार खेलता रहा, तो वह प्रभावी तौर पर अपने ब्रांड का प्रसार नहीं कर सकता. उसके दीर्घकालीन ब्रांड वैल्यू पर भी असर पड़ता है. इससे बेहतर यह है कि वह खिलाड़ी घरेलू क्रिकेट में मेहनत करे और फिर जोरदार वापसी करे. कोहली में वह दम है. इन पहलुओं पर गौर करने से आगे का रास्ता निकल सकता है. 

सौरव गांगुली बीसीसीआई के अध्यक्ष हैं और राहुल द्रविड़ मुख्य कोच. टीम इंडिया का अगला निशाना ऑस्ट्रेलिया में टी-20 वर्ल्ड कप है. गांगुली और द्रविड़ की जोड़ी को वापस 2007 में जाने की जरूरत है, जब टी-20 वर्ल्ड कप में गांगुली, द्रविड़ और सचिन तेंदुलकर जैसे दिग्गज टीम से बाहर रहे, महेंद्र सिंह धौनी के नेतृत्व में युवा टीम ने इतिहास रच दिया था. 

क्या आगामी टी-20 वर्ल्ड कप में रोहित शर्मा, विराट कोहली और केएल राहुल की तिकड़ी को बाहर रख कर हार्दिक पंड्या या ऋषभ पंत की अगुवाई में युवा टीम को नहीं आजमाया जा सकता? बदलते दौर में पहले तीन नंबर पर राहुल, रोहित और विराट को भेजना एक रक्षात्मक रणनीति होगी, जबकि संजू सैमसन, ईशान किशन, दीपक हुड्डा और सूर्य कुमार यादव जैसे युवा भारतीय क्रिकेट में एक नये दौर का आगाज कर सकते हैं.