गुरु की महिमा

(१)

गुरु हिमराज,गुरु अधिराज,गुरु का रूप,ज्यों ईश।

गुरु आगार,सद साकार,गुरु के चरण,नित शीश।।

गुरु नित वेद,नहिं हो खेद,मिले सुरवर,यह चाह।

गुरु दिनमान,गुरु पहचान,गुरु से मिले,नव राह।।

(२)

गुरुवर नमन,दुख का हनन,खिलता चमन,वतन-मान।

संत समान,नवल विहान,नहिं अभिमान,हिमवान।।

गुरु-सा कौन,सब हैं मौन,गुरु की जीत,यह साँच।

गुरु उजियार,सुख-संसार,गुरुवर-सार,लो बाँच।।

(३)

नभ बना जो,सिर तना जो,सुर सना जो,गुरु ताज।

शिष्य के पल,करके सरल,मन हो विमल,बन साज़।।

गुरु सुहावन,मन लुभावन,नित सुखावन,वरदान।

ग्रंथ कहते,सत्य बहते,शिष्य वरते,सच जान।।

(४)

नींद मारे,शिष्य तारे,गति बढ़ाये,है ताल।

गुरु मुहब्बत,गुरु इबादत,गुरु सोहबत,सद काल।।

है सरल गुरु,है तरल गुुरु,लालिमामय,नव गान।

नित लुभाता,त्याग गाता,गुरु विधाता,है प्रान।।

(५)

चमन जैसा,शिथिल कैसा,दूर पैसा,नव काम।

गुरु सुहाये,ख़ूब भाये,जग जगाये,है धाम।।

दोष मारे,गुण बुहारेे,दे सहारे,नव ज्ञान।

है सुधा-सा,नित सधा-सा,जयघोष है,प्रतिमान।।

(६)

गुरु है फूल,हारे शूल,वह तो ईश,प्रवहमान।

रच दे नया,नहिं बद रहा,जीवंत सब,नव शान।

गुरु गीतिका,संगीतिका,अनुराग वह,संवेग।

आलोक गुरु,नव लोक गुरु,अंदाज़ नव,शुभ नेग।।

(७)

तिमिर हरता,भाव भरता,मांगलिक गुरु,आसान।

विजय धरता,शिष्य बढ़ता,गुरु गतिशील,सम्मान।।

गुरु विहँसता,जगत रचता,सृजनकारी,नव प्रीति।

गुरु भगवान,नवल विहान,युग का सार,नव नीति।।

(८)

गुरुवर नूर,दुख सब दूर,गुरु सिन्गार,यशगान।

गुरु गुणगान,गुरु बलवान,गुरु युगबोध,अरमान।।

नव प्रगति गुरु,नित सुमति गुरु, गुरु नित जीत अहसास।

हर पल महक,जीवन चहक,सार सतत,विश्वास।।


        -प्रो0 (डॉ0) शरद नारायण खरे