मन की फेर.....?

बड़ी गजब की बांसुरी 

          बड़ी गजब की धुन।

बात फते की मैं कहु,

          ध्यान लगाकर सुन।

मंजर कितने देख लिए,

    राही राह ताके अब बाकी।

खालिक बन गया नीरस मन,

  मंजर जिसका अब भी शाकी

भावी गुजरी जो राहो पे,

      दो मुठ्ठी की थाली हो।

पेट भूख को तरस रहा।

      कोठी जिसकी खाली हो।

मांगे वक्त जवाब सभी से,

           क्या दूरी क्या पास हो।

कल फिक्र की उलझन कैसी,

      जब  वर्तमान की आस हो।

टूट किनारा अपने की हो,

  डराता है तब वक्त की आंधी।

टूटते है समय की धार पे,

       जब छोड़ दे साथ संबंधी।

विश्वास प्रखर की विजयी हो,

    हृदय अधर जब धवला हो।

लट्टू बन फिर घूम रहा,

  मन भी जितना बावला हो।

हम सोच रहे उस आदी को,

     जीवन की उस बर्बादी को।

गिर गए जो उठ न पाए,

      सहमा सा अज्ञेयवादी को।

माया की तोड़ दीवारे जोगी, 

     गीत हृदय से गुनगुना रही।

सार रस जीवन की अपनी,

   चहक चिड़िया भी सुना रही।


             दिब्यानन्द पटेल

             विद्युत नगर दर्री 

             कोरबा छत्तीसगढ़