चलो उसी पनघट पर मिलें।।

जिस पनघट पर तुम नित सवेरे,

पनिया भरने आया करती थीं।

सखियों संग अटखेलियां करती,

मुझे देख शरमाया करती थीं।।

चलो उसी पनघट पर मिलें।।


जिस पनघट पर मुझे देख तुम,

शर्मोहया से शीश झुकाया करती थीं।

हौले-हौले मुझे देख मुस्काती,

सखियों से बतियाया करती थीं।।

हाँ,चलो उसी पनघट पर मिलें।।


जिस पनघट पर तेरा दीदार करने,

सहगामी संग मैं आया करता था।

तेरी  गागर  पर  कांकर  मार,

मैं गागर छलकाया करता था।।

हाँ, चलो उसी पनघट पर मिलें।।


जिस पनघट से हम दोनों की,

      यादें जुड़ी हुई हैं।

जो पनघट हम दोनों के मिलन की,

         साक्षी बनी हुई है।।

हाँ, चलो उसी पनघट पर मिलें।।


जिस मधुबन में राधा सह केशव,

होली खेलन जाया करते थे।

ब्रज की गलियन में राधा, संग,

माधव रास रचाया करते थे।।

चलो उस ब्रज रूपी पनघट पर मिलें।।


       महेन्द्र साहू"खलारीवाला"

        गुण्डरदेही बालोद छ ग