पुरुष का सौंदर्य

पुरुष का सौंदर्य और पराक्रम ही आदिकाल से नारी को आकर्षित करता रहा है।यह सौंदर्य केवल बाहरी न होकर आंतरिक हो अत्यंत महत्वपूर्ण है।

 'सत्यम् शिवम् सुंदरम' यह तो हमेशा ही कहा गया है जो सत्य है वही शिव है और शिव ही सुन्दर हैं। 

कान्हा के सौंदर्य का वर्णन सूरदास जी ने जिस प्रकार किया है समस्त संसार आज भी उस चित्रण की कल्पना मात्र से प्रसन्न हो जाता है।सच तो यह है मैंने भी अपने आसपास बहुत सारे ऐसे पुरुषों को पाया है जो बहुत सुंदर हैं।

उनको सुन्दर होने के लिए अतिरिक्त श्रम की भी आवश्यकता नहीं है। उदाहरण स्वरूप मेरे पति,पिता, भाई और न जाने कितने पुरुष मित्र हैं जो सुन्दर हैं।

यह सुंदरता उनकी केवल बाहरी सुंदरता नहीं है उनमें एक दैवीय आकर्षण है जो किसी को भी बरबस आकर्षित करता है ।

जो सृजनात्मक है वह सुन्दर है और जो विध्वंस करने वाला है वो भयंकर है। 

चाहे वो नारी हो या पुरुष।जब एक पुरुष नारी को स्नेह प्रेम और सौहार्द प्रदान करता है तो वह स्वयं: ही सौंदर्य से परिपूर्ण हो जाता है। वही पुरुष जब आसक्ति,वासना के कीचड़ में लिपट कर सम्मुख आता है तो वह कुरूप लगने लगता है। आसुरी प्रवृत्ति मानव को असुर बनाती है और सृजनात्मक शक्ति दैवीय और सुन्दर बनाती है।

पुरुष का सौंदर्य के प्रति आकर्षण को आज बाजार ने भी समझ लिया है और भिन्न-भिन्न के उत्पाद बाजार में उपलब्ध हैं जो निरर्थक ही हैं फिर भी कुछ पुरुष न जाने  कैसे उनके झांसे में आने लगे हैं जिस प्रकार पहले नारियों को लुभाया और नारी का कोमल मन उस चक्र में फंस गया जिससे अब वो धीरे धीरे ही सही निकल रही है।

      स्वरचित एवं मौलिक रचना

          अनुराधा प्रियदर्शिनी

          प्रयागराज उत्तर प्रदेश