मैं और वह

आंगन में आज भी

अमरूद खिलखिला रहा

मेरे मधुर बचपन की 

यादें  दिला  रहा

       सोचूं वह बड़ा हुआ

       मैं छोटा रह गया

       वह उदार आज भी

       मैं खोटा रह गया

       अपने को पढ़कर मैं

       खुद , तिलमिला रहा।

हरी हरी पत्तियों में 

आज भी मुस्कान है

कहतीं वे हर्ष में ही

जीना आसान है

आज भी अमरूद मुझे

प्यार से बुला रहा।

         बचपन से दूर हुआ 

         आ गई जवानी

         शुरू हुई अनगिन

        गल्तियों की कहानी

         अपनी ही चोट से

          हरपल, बिलबिला रहा।

क्या खोया क्या पाया

जोड़ने में व्यस्त हूं

अपने ही कर्मों से

सुबह शाम पस्त हूं

मैं अमर्ष  में ही भले

वक्त झिलमिला रहा।

           देखन में मृदुल मृदुल

           आज भी वह मधु है

            एक सत्य खड़ा!कहे

            मानव मन कटु है

            आओ!कह स्नेह के

            झुले में झुला रहा

गुनते बिनते एक दिन

मैं खुद भी थक गया

जैसे अमरूद पका

वैसे ही पक गया

अंत अपनी सांसों में

पलछिन घुला रहा।


- डॉ. गोरख प्रसाद मस्ताना

बेतिया , बिहार