प्रेम समरागिनी

प्रेम-सी समरागिनी

धधकने लगी है,

कहो आकर शांत करोगे?

फिर यदि सुषुप्त हुई

जो ज्वालायें क्या तुम 

जागृत कर सकोगे?

अनंत कोटि-सी

लड़ी बनाती

क्या तुम धारण

कर सकोगे?

अब छोड़ो भी

आ भी जाओ,

प्रेम समरागिनी

मिटा भी जाओ!

आख़िर कब तक रण में

अकेले प्रहार करोगे?

कभी साथ हमें मिलवा दो

उस दुश्मनों से

दो-चार को ही सही

कर उनकी दीक्षा

याद दिला देंगे!


शिवांगी पांडेय

मऊ,उ0प्र0-6388512448