माता की बदलती सवारी

माता कभी खुदा खुदा करती हैं तो कभी महाकाली की स्तुति या चामुंडा मां की स्तुति बोलती हैं।कौनसा रंग सही वह तो उनके संगी ही जाने हमे तो विक्षिप्तता के दर्शन ही होते हैं।कभी विरोधियों को मारना उनकी महिलाओं की इज्जत को तार तार करना आदि के लिए प्रख्यात माता कहो या दीदी ,तैयार रहती थी उसे एक कमजोर घोड़े और उसकी मां का साथ जो था।विपक्ष को हवा में उड़ने के सपने भी साथ साथ देखें कई साल लेकिन अब गुब्बारे से हवा निकलती प्रतीत हो रही हैं।नाराजगी से बेचारों से मुंह मोड़ दूसरी और चल पड़ी हैं।

   अब नजर हैं महाराष्ट्र के तीन पहोलियों में से एक पर।एक  पहिए की तो उन्ही के साथी ने फुस्स से हवा निकाल दी जो कहीं का नहीं रहा शायद वहीं पड़ा पड़ा जंग खा के सड़ जाना हैं।

 दूसरा जिसे अब तक माता ने अपना वाहन बनाया था उसे पुरानी कह कर नाता ही नहीं तोड़ा, तंज कस कस कर बेइज्जत भी कर लेती हैं।ये वही कमजोर घोड़ा हैं जिसकी सवारी माता करती आई हैं।लेकिन ये महाराष्ट्र की गाड़ी का तीसरा जो  अब कबाड़ी के संग वाले बूढ़े घोड़े के संग आंख लड़ाई हैं।सोचती होगी बूढ़ा घोड़ा उसके कंट्रोल में रहेगा लेकिन ये दुलत्ती मारने वाला  घोड़ा हैं ये शायद नहीं जानती ये। बूढ़ा घोड़ा कमजोर घोड़े का भी साथी रहा हैं वहां भी दुलत्ती मार कर ही निकला था।बड़े बेइज्जत हो के भी करके भी निकला था वहां से।लेकिन अनबन होने और दुलत्ती मार भाग आया फिर भी उसी से दोस्ती भी कर उसके फायदे उठाएं हैं।

  क्या कमजोर घोड़े की सवारी छोड़ माता को बूढ़े घोड़े की सवारी से राजनैतिक फायदा होगा क्या? क्या हैं सच ये तो आनेवाला समय ही बताएगा।या फिर दुलत्ती मार भाग जायेगा या महाराष्ट्र के दोनों साथियों को बरबाद किया वही फॉर्मूला यहां भी आजमाएगा?

जयश्री बिरमी

अहमदाबाद