अस्थिरता में स्थिरता की तलाश , छटपटाहट व बेचैनी : अमन

 युग जागरण न्यूज़ नेटवर्क  

अस्थिरता जिंदगी में कोई नया अल्फाज नहीं है कि जिससे कोई वाकिफ नहीं हो । लेकिन यह अस्थिरता इन दिनों आम जिंदगी से अधिक सरकारों व राजनीतिक पार्टियों के भीतरखाने के गठजोड़ में देखी जा रही है । वैसे भी हिंदुस्तानी राजनीति और अस्थिरता का चोली-दामन का रिश्ता रहा है । जब-जब गठबंधन की सरकारें बनी है, तब-तब अस्थिरता अपने परवान पर रही है । गठबंधन सरकारों में सबके अपने-अपने हित, अपने-अपने उसूल होते हैं । जिससे टकराव की स्थिति पैदा हो ही जाती है और सरकार व गठबंधन में अस्थिरता के हालात धरातल पर आने लगते है । हाल ही के दिनों में राजस्थान, महाराष्ट्र राज्यों के ताजा उदाहरण राजनीति में अस्थिरता को समझने के लिए काफी है ।

अस्थिरता की स्थिति में गठबंधन हो या सरकार सब कुछ दांव पर आ जाता है जिसके चलते कई-कई बार एक राज्य की सरकार दूसरे राज्यों में कैद हो जाती है, अपने साथियों को भी नजरबंद तक कर देते हैं । हाल ही में महाराष्ट्र सरकार में पैदा हुए हालात अस्थिरता का पुख्ता प्रमाण है । महाराष्ट्र महा विकास आघाडी गठबंधन की सरकार उस वक्त अस्थिर हो गई जब मुख्य पक्षी दल शिवसेना के ही विधायकों ने एकनाथ शिन्दे के नेतृत्व में बगावत कर दी । जब तक मैं यह कितना कुछ लिख रहा है तब तक स्थिति यह है कि शिवसेना के आधे से अधिक विधायक आसाम राज्य की राजधानी गुवाहाटी के होटल में शरण लिए हुए हैं । जहां इन दिनों बाढ़ से हालात बद से बदतर हो रखे है । वहां के आम लोगों को अपने-अपने ठिकानों और घरों को छोड़कर अन्यत्र शरण लेनी पड़ रही है, सुरक्षित होना पड़ रहा है । बाढ़ वाले क्षेत्रों के लोगों का सब कुछ दांव पर लगा हुआ है ठीक वैसे ही जैसे महाराष्ट्र सरकार का सबकुछ दांव पर लगा हुआ है ।

शिवसेना के मुखिया उद्धव ठाकरे उसी के चलते ‘वर्षा’ से ‘मातोश्री’ में लौट चुके हैं, सत्ता का मोह त्याग चुके है । उद्धव ठाकरे अपनों से यह अपील भी कर चुके है कि वो जो चाहते है, वह सब वो करने को तैयार है, बस वो बातचीत करे , अपनी अजीयत को बया करे, वो सुनने व समझने को तैयार है । राजनीति में ऐसी स्थिति में कोई भी यह निश्चित नहीं कह सकता कि इस अस्थिरता का अंत कब और कैसे होगा ? क्या गुवाहाटी से एकनाथ शिन्दे गुट महाराष्ट्र लौटकर सरकार बनाने का दावा पेश करेगा या वर्तमान मुखिया उद्धव ठाकरे सभी अस्थिरताओं को खत्म कर पुनः ‘राज-काज’ का संचालन करेंगें ? महा विकास अघाडी का साथ रहेगा या छूटेगा ? इस दौर में ये सब सवाल फिलहाल निरूत्तर है ।

अब तो यही लगता है कि या तो यह सब समय की सड़क पर ही तय होगा कि गुवाहाटी पहुंची गाड़ी पुनः किधर लौटती है ? या माननीय न्यायालय की शरण के सहारे अस्थिरता स्वयं अपना अन्त करेगी ? इन सब में एनसीपी, कांग्रेस, शरद पंवार, संजय राउत आदि की अपनी-अपनी भूमिका है जिनके सहारे आगे का सफर तय होगा । वही अस्थिरता के बाद शिवसेना की ओर से लगातार आ रहे बयानों से लगता है कि भाजपा की उपस्थिति भी खासी महत्वपूर्ण रहेगी । वजाहत का दौर परवान पर है । समस्त घटनाक्रम में सभी का जोर अस्थिरता में स्थिरता की तलाश पर ही रहेगा ताकि भविष्य में चुनाव और वोटों के लिए आखिर सब को जनता-जनार्दन के पास ही जाना है ।

महाराष्ट्र सरकार में पैदा हुई अस्थिरता के बाद अब सभी में छटपटाहट व बेचैनी का आलम इस कद्र है कि सबको सुकून की तलाश है, सब हसद को मिटाना चाहते है । ऐसे में सभी येन केन प्रकारेण अपना अर्थ और उद्देश्य सिद्ध करते हुए आसाम आदि की शरण लिए हुए विधायक-नेता आखिर स्थिरता की छांव में ही शरण लेंगे । इन सब में यह देखना भी खास रहेगा कि इतने उठापटक के घटनाक्रम के बाद शिवसेना एक होगी या अलग-अलग गुटों में बंटकर दो हो जायेगी ।


मुकेश अमन

साहित्यकार

बाड़मेर राजस्थान