4 जुलाई (जन्म दिन) , ज्योति पुरुष गुलजारी लाल नन्दा जी !

रामप्यारे त्रिवेदी

(पूर्व निजी सचिव, श्री गुलजारीलाल नन्दा)

‘‘भारतरत्न’’ श्री गुलजारीलाल नन्दा का जन्म 4 जुलाई 1898 को अविभाजित पंजाब के स्यालकोट जिला के गढ़थल ग्राम में श्री बुलाकीराम नन्दा के परिवार में हुआ था। प्रारम्भिक शिक्षा गांव की पाठशाला में हुई, माध्यमिक शिक्षा लाहौर और आगरा में मिली और उच्च शिक्षा के लिये इलाहाबाद विश्वविद्यालय की ख्याति उन्हें प्रयागराज ले गई। वहां से अर्थशास्त्र में एम.ए. और कानून की डिग्री प्राप्त की। नन्दाजी में अच्छा संस्कार, प्रखर बुद्धि और पढ़ने की लगन, यही तीनों गुण देखकर उनके अंग्रेज प्रोफेसर एच. स्टेनली जीवोन्स ने उन्हें शोध छात्रवृत्ति दिलवा कर ‘‘भारत की मजदूर समस्या’’ पर थीसिज़ लिखने के लिये 1921 में अहमदाबाद भेजा, जहां उस समय सूती कपड़ा मिलों में काम करने वाले मजदूरों की संख्या एक लाख थी जो भारत के हर भाग से आकर यहां काम करते थे। उनके बीच 1918 में गांधीजी ‘मजूर-महान सभा’ सम्बोधन से एक संगठन बना कर प्रवेश कर चुके थे, जिन्होंने नन्दा जी को चुम्बक की तरह अपनी ओर खींच लिया। उनके कार्यक्षेत्र की दिशा बदल गई वे बाइस वर्षों तक श्रमिक कल्याण के लिये अहमदाबाद की मजदूर जनता से जुड़े रहे। 

इसी अवधि (1927) में अहमदाबाद नगर निगम के सभासद के रूप में नन्दा जी का राजनीति में प्रवेश हुआ था। यहीं से 1937 में स्वायत्त शासन के लिये बम्बई राज्य विधान परिषद् के सदस्य चुने गये। (तब गुजरात अलग प्रान्त नहीं बना था) 1946 में पुनर्गठित बम्बई राज्य विधान सभा में विधायक चुन कर आ गये। इस बार बम्बई राज्य के लोकप्रिय मुख्यमंत्री श्री बालासाहब खेर ने नन्दा जी को श्रम तथा मकान मंत्री बनाया। इनके प्रयास तथा प्रस्ताव से ‘‘श्रमिक विवाद बिल’’ एवं ‘‘श्रमिक सम्बन्ध बिल’’ पहले बम्बई विधान सभा में पास हुये फिर उनके आधार पर केन्द्रीय सरकार के अनेक श्रम कानून बने। भारत स्वतंत्र होने से चार माह पूर्व मई 1947 में नन्दा जी के भगीरथ प्रयास ‘‘इंटक’’ (इण्डियन नेशनल ट्रेड यूनियन कांग्रेस) बनाने में सफल हुये। अब तक वे श्रमिक आन्दोलन के शिखर-पुरुष बन चुके थे। 

1950 में प्रधानमंत्री पण्डित जवाहरलाल नेहरू की अध्यक्षता में योजना आयोग बना, जिसके प्रथम उपाध्यक्ष नन्दा जी बनाये गये, इस तरह केन्द्र की राजनीति में उनका प्रवेश हुआ था। नेहरू जी के नेतृत्व में नन्दा जी ने तीन पंचवर्षीय योजनाओं का सफल संचालन किया, जहां कपड़ा सिलने की सुइयाँ भी विदेशों से आयात होती थीं, यहां अपने देश में हवाई जहाज बनने लगे, मानो विकास ही नन्दा जी के प्राणों का स्पन्दन था। वे विद्युत मंत्री, सिंचाई मंत्री, श्रम मंत्री और योजना मंत्री, एक साथ चारों पदों पर वर्षों तक रहे।

 सितम्बर 1963 में जवाहरलाल जी ने नन्दा जी को गृह मंत्री बना दिया, इस पद पर आते ही उन्होंने दो वर्षों में भ्रष्टाचार खत्म करा देने की लोकसभा में घोषणा कर दी, इसके लिये केन्द्र में कुछ कानून बने, सामाजिक चेतना के लिये योजना मंत्री के रूप में आप भारत सेवक समाज तथा भारत साधु समाज की स्थापना कर चुके थे किन्तु भ्रष्टाचार उन्मूलन की घोषणा के साथ नन्दा जी ने गांव-गांव में ‘सदाचार समितियां’ स्थापित करने का आह्वान भी किया था। 

27 मई 1964 को नेहरू जी के दिवंगत होने पर नन्दा जी को प्रधानमंत्री पद की शपथ सर्वपल्ली डा. राधाकृष्णन (तत्कालीन राष्ट्रपति) ने दिलाई। भारतीय संविधान में प्रधान मंत्री का पद एक पल भी रिक्त नहीं रह सकता, इसलिये नन्दा जी को यह सम्मान मिला, फिर 14 दिन बाद कांग्रेस संसदीय दल के नेता चुने जाने पर स्वनाम धन्य श्री लालबहादुर शास्त्री भारत के प्रधान मंत्री बने थे। उन्हीं के कार्यकाल में 1965 में जब भारत-पाक युद्ध हुआ तो दस दिनों तक फौजी वर्दी में रहकर गृहमंत्री नन्दा जी ने राष्ट्र का मनोबल बढ़ाया था।

 11 जनवरी 1966 को ताशकन्द (सोवियत रूस) में हृदयगति रूक जाने से जब शास्त्री जी का निधन हो गया तो उस त्रासदी में पुनः नन्दा जी को प्रधान मंत्री पद की शपथ दिलाई गई। फिर 14 दिन बाद इन्दिरा गांधी प्रधान मंत्री बनी। देशकाल की जिस परिस्थिति में श्रीमती इन्दिरा गांधी सत्ता की केन्द्र बिन्दु बनी थी, उसमें बहुत कुछ नया-नया दिखने लगा था, पुरानों में केवल नन्दा जी उनके साथ ‘इन्द्रधनुष’ की तरह थोड़े समय तक देखे गये थे।

शायद भारतीय लोकतंत्र के इतिहास में दोबारा ऐसा विलक्षण संयोग नहीं दिखेगा, जिसमें एक गृहमंत्री (नन्दा जी) तीन-तीन प्रधान मंत्रियों के कार्यकाल से जुड़ा हो। श्रीमती इन्दिरा गांधी तीसरी प्रधान मंत्री थीं, जिनके गृहमंत्री नन्दा जी रहे, मगर 7 नवम्बर 1966 को गोवध पर प्रतिबन्ध लगाने की मांग करते हुये दिल्ली में साधुओं की जो शोभायात्रा (जलूस) निकली थी, उसमें अराजक तत्त्व भी साधुओं का वेश बनाकर घुस आये थे, जिन्होंने लोकसभा के सामने होने वाले विराट् सभा के समीप पहुँच कर हिंसा फैला दी, पुलिस की गोलियाँ भी चलने लगीं, सभा को समाप्त करना पड़ा।

 इस हिंसा के कारण नन्दा जी को गृहमंत्री पद से त्यागपत्र देना पड़ा। यह एक स्वस्थ परम्परा है कि त्यागपत्र देने वाले केन्द्रीय मंत्री को एक बार संसार में अपनी स्थिति और कारण को स्पष्ट करने का अवसर मिलता है, वह उन्हें मिला। 11 नवम्बर 1966 को संसद में नन्दा जी ने तीन बातें कहीं- 1. ‘‘मेरे पास एक माह पूर्व गो भक्तों का एक प्रतिनिधि मण्डल मिलने आया, उसने 7 नवम्बर को दिल्ली में एक साधु शोभा यात्रा निकालकर सरकार पर दबाव बनाने के लिये लोकसभा के सामने एक विराट् सभा करने की अनुमति मांगी, हमने उन्हें दी क्यों कि लोकतंत्र में यह उनका अधिकार बनता था। 

2. ‘‘मैं स्वयं इस पक्ष में हूं कि सम्पूर्ण भारत में गो हत्या पर प्रतिबन्ध लगना चाहिये-गाय, भारतीय संस्कृति में श्रद्धा रखने वाले करोड़ों स्त्री-पुरुषों की पूज्य है।’’ 3. अन्त में मुझे यह कहना है कि साधुओं की सभा में मुट्ठी भर की नगण्य संख्या वाले जो अपराधी घुस आये थे उन्हें साधुओं के नकली भेष में भेजने वाले वह लोग थे, जिन्हें मेरा ‘भ्रष्टाचार उन्मूलन अभियान’ खल रहा था। मेरे प्रशासनिक अधिकारी ने मुझे अंधेरे में रखा।’’ इस भाषण से पहले भी हजारों बार नन्दा जी संसद में बोले थे, मगर तब पण्डित जवाहरलाल नेहरू और लालबहादुर शास्त्री उनके व्यक्तित्व की ढाल थे, इस बार के भाषण में श्रीमती इन्दिरा गांधी की मुख राजनीति का एक मौन दृश्य था। 

शायद किसी भी सांसद ने नन्दा जी के इस भाषण पर अपनी प्रतिक्रिया नहीं व्यक्त की थी। (नन्दा जी 1970 में एक वर्ष रेल मंत्री भी रहे) गृह मंत्री पद से हटने के बाद भी कर्मयोगी नन्दा जी का कद छोटा नहीं हुआ अपितु युगों-युगों की स्मृतियों में स्थापित हो जाने वाला एक नया अध्याय और खुला। 

1966 में ही हरियाणा नया राज्य बना, इंटक के नेता पण्डित भगवत दयाल शर्मा वहां के मुख्यमंत्री बनाये गये, ये 1967 के आम चुनाव में नन्दा जी को हरियाणा के कँथल (कुरुक्षेत्र) लोक सभा क्षेत्र से जीत कर आने वाले नन्दा जी इस बार हरियाणा से जीतकर आये और नया इतिहास रचा। 1968 में हरियाणा के तत्कालीन मुख्यमंत्री चौधरी बंसीलाल ने नन्दा जी की अध्यक्षता में ‘कुरुक्षेत्र विकास बोर्ड’’’ का गठन किया, 1990 तक वे इस बोर्ड के अध्यक्ष रहे। इन बाइस वर्षों में नन्दा जी ने कुरुक्षेत्र को कृष्णमय कर देने के सारे उपक्रम करके स्थाई विश्राम के लिये अहमदाबाद अपनी पुत्री के पास आ गये।

यद्यपि श्री नन्दा जी का सारा जीवन राजसत्ता और राजनीति में गुजरा, मगर समाज ने उन्हें संतों जैसी श्रद्धा क्यों प्रदान की? जैसे पृथ्वी के नीचे जहां भी खोदा जाय, पानी मिलेगा, उसी तरह भारत की प्रबुद्ध प्रौढ़ पीढ़ी तथा वरिष्ठ युवाओं के हृदय में नन्दा जी का नाम सुनते ही क्यों श्रद्धा छलक पड़ती है? उनके प्रति श्रद्धा का आधार उनके जीवन का पुरुषार्थ चतुष्टय है। सनातन धर्म में जीवन के चार पुरुषार्थ माने गये हैं- धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष, यह चारों पुरुषार्थ नन्दा जी के जीवन में विद्यमान थे। धर्म के क्षेत्र में वे आधुनिक युग के धर्मप्राण पुरुषों में अग्रगण्य थे। अर्थ के क्षेत्र में उनके हस्ताक्षरों से असंख्य अरब रुपये जनहित में खर्च हुये। काम के क्षेत्र में गृहस्थ नन्दा जी ने कर्म की संस्कृति को नैतिक दृष्टि प्रदान की थी। 

मोक्ष मार्गी नन्दा जी कैसे रहे, इसका संकेत उनकी सुपुत्री डा. पुष्पा नायक ने इन शब्दों में दिया है- ‘‘मेरे पिता जी विगत एक वर्ष से कोई जरूरत पड़ने पर मेरा नाम लेते हैं- बाकी चौबीसों घण्टे उनके मुख से ‘‘श्री हरिशरणम्-श्री हरिशरणम्’’ की ध्वनि निकलती है’’ संसार की मोह-ममता से ‘‘मुक्त मानव’’ ही मोक्ष का अधिकारी होता है, इसका जीवन्त प्रमाण देकर नन्दा जी 15 जनवरी 1998 को ब्रह्मलीन हुये थे। नन्दा जी ने भूतकाल के शुभ-आचरण दर्शन का सब कुछ ग्रहण किया, इसीलिये वे वर्तमान के प्रकाश बने या प्रकाश में जिये और नये भारत का उज्जवल भविष्य बनाने वाली योजनाओं के सूत्रधार बने। इस प्रकार का यज्ञमय जीवन जी कर नन्दा जी समाज में ‘‘संत पुरुष’’ के रूप में प्रतिष्ठित हुये थे।