हवा बसंती लगती हो.

छवि तुम्हारी चांद सी लगती और लगती हैं तारों सी

कभी कभी तुम कमल सी लगती जैसे फूल बहारों की।


गिरी के भांति मन ये तुम्हारा चीत उपवन सी लगती हैं

नयन तुम्हारे मृगनैनी सी मनभावन सी लगती है।


पांव के पाजेब तुम्हारे गीत सुनहरे गाते है

और हाथों की कंगन अक्सर कोयल तान सुनते हैं।


बिंदियां लगते चांद सितारें परियों सी सीरत पाई हो

इस धरती की नहीं हो लगती क्या तुम स्वर्ग से आई हो?


हाथों की मेंहदी ये तुम्हारे रंग हिना की लगती हैं

तुम पर सुर्ख गुलाबी साड़ी मोड़ पंख सी लगती हैं।


गंगा के मीठी पानी सी बोल तुम्हारे लगते हैं

और होठों पर लाल लिपिस्टिक फूल गुलाब के लगते हैं।


जब भी गुजरते इन राहों से हवा बसंती लगती हो

लगे की रंग बसंती आई जब पांव जमीं पर रखती हो।


पूजा भूषण झा, वैशाली, बिहार।