ग़ज़ल: मैने रातों में भी जलता वो पिता देख लिया

जैसे राजा को कहीं रंक बना देख लिया

मैंने राहों में पड़ा एक दिया देख लिया


ज़िंदगी तुझसे हसीं यार ख़ुदा देख लिया

जैसे आँखों ने मेरी सब्ज़ समा देख लिया


डगमगाने ही लगे मेरे कदम हाला बिन

देखकर तुमको लगा जैसे नशा देख लिया


कोई ख़्वाहिश नहीं मेरी की ख़ुदा को देखुँ

मैने रातों में भी जलता वो पिता देख लिया


मैंने दंभी को कहीं ग़र्द में मिलते देखा

तो कहीं सच के लिए रब को झुका देख लिया


अब नहीं हमको यकीं यार मुहब्बत में कहीं

मैंने हर आह में उल्फ़त का सिला देख लिया


प्रज्ञा देवले✍️