" धरती के दुखांतवीर दुखक्कड़ "

कुछ लोग बेहद दुखांत आत्मा होते हैं.. पता नहीं कहां से इतना दुख खरीद लाते हैं यह होलसेल में स्टाक रखे रहते हैं.. ना खुद खुश रहते हैं ना किसी और को खुश देख पाते हैं .. उनके चेहरे पर दुख स्थाई पक्का मकान बनाकर रहता है ...अगर कोई उस व्यक्ति के निकट से भी गुजर जाए तो उसका दो-चार दिन दुख भरा ही बीतता है हर कालखंड में ऐसे लोग विराजमान थे.. अब सतयुग में ही मंथरा को देख लीजिए  ... उसको अयोध्या का राज ना लेना था ना अयोध्या का राज किसी को देना था ..पर जहां मंगल गान बज रहा था वहां पर भी उसने दुख का राग बजवा दिया और कलयुग की तो बात ही छोड़िए यहां तो भरमार पड़ी है दुखी आत्माओं की... यहां पर तो अपने सुख को देखकर लोग सुखी कम होते हैं दूसरे को सुख को देखकर दुखी ज्यादा होते हैं।

यह स्वभावगत परेशान रहने वालों को शुद्ध घी के लबालब भरे हुए तालाब में भी स्नान करवा दीजिए लेकिन इनको संतुष्टि नहीं मिलेगी इनको मोक्ष तभी मिलेगा जब दूसरों को दुखी करने का परमार्थ करें ..इनका स्वभाव ना बदलना है ना बदलेगा, हर किसी के मित्र मंडली में एक इंसान ऐसा दुखी तो होता है  कि जिस का दुख सब के सुख के ऊपर भारी पड़ता है और वह इसी ताक में रहता है कि कब अपना दुख दूसरों को चरणामृत जैसे थोड़ा-थोड़ा बांट दें और थोड़ा सा हल्का हुआ जाए ..दुख को भी दुख होता है कि किस दुखी के पास पहुंच गया जल्दी से अगली गाड़ी से रिजर्वेशन हो और यहां से निकल लु  ....अगर इनके पास अपना कोई दुख नहीं बचा हो तो यह मोहल्ले , शहर का दुख लेकर बैठ जाएंगे पर माहौल को गमगीन कर देंगे ....मजाल है जो हंसी खुशी को पास फटकने दें या भटकने दे... जब तक दो चार लोगों के चेहरे की खुशी छीन ना ले तब तक इन लोगों के गले से निवाला नहीं उतरता है चाहे इनको मालपुआ खिलाइए या रबड़ी इन्हें स्वाद तभी आता है जब दूसरों के मुह का स्वाद बिगाड़ देते हैं!! जो हो जाए पर यह आदत से बाज नहीं आते इनकी तो सारी खुशी ही इसी पर टिकी होती है कि लोगों को दुखी कर ले और इनको आत्मिक संतोष मिले।

रेखा शाह आरबी 

बलिया (यूपी)