पिता

पिता से घर संसार है बसता, मां  का भी उसमें साथ हैं होता।

मोती की तरह, धागों में , घर संसार को है पिरोता।

मुश्किलों से नहीं है घबराता, चट्टानों की तरह अडिग है रहता।

पिता की छत्र छाया, में जीवन को नया रंग हैं मिलता

सुने आंगन में ,जैसे उगता है हर खुशी का रंग है झलकता।

कंधो पर सारा बोझ लिए   दिन रात मेहनत है करता।

पिता से घर संसार है बसता,मां का भी उसमें साथ है होता।

 पिता रहता है शांत ना जाने कितने बोझ लिए कंधो पर।

फिर भी  मुस्कान है बिखेरता,सब का मुख देख कर।

पिता की आशा है उसका परिवार, चाहता हैं, 

चांद तारो की तरह चमकता रहे उसका घर संसार।

पिता ,रोता है पर आसू नहीं दिखते, छुपा लेता है अपना राज।

बाते करे जब इनसे, अपनी इच्छा बताने से करे इनकार,ये हैं पिता का प्यार।

पिता से घर संसार है बसता मां का भी उसमें साथ है होता।

स्वरचित ✍️✍️

अनामिका प्रिया

पटना, बिहार