भावना

भावना से जुड़ा ये मानव मन।

बिन भावना सार्थक नहीं ये जीवन।

मन की भावना शब्दों से करती संघर्ष,

बनती जाती है कविता फिर अनवरत।


भावना बताती है इंसान की फितरत,

कौन अपना है और कौन बेमुरौवत।

होती जिनमें परहित की भावना,

ईश करते पूरी उनकी कामना।


स्वार्थ परायण लोग मुँह की खाते हैं,

जीवन के अंत काल पछताते हैं।

जीवित होने की पहचान यही 

इंसान हो या जीव जंतु सभी,

भावना जिस उर में नहीं,

मृत्यु तुल्य प्राणी है वही।


          रीमा सिन्हा (लखनऊ)