पतंग की डोर

क्यों बैठी हो दुविधा में 

अतीत से अपने आघात हो कर

उठ खड़ी हो, झटक कर बेड़ी

अब उड़ , तोड़ कर पिजरे को 

पंखों को फैला कर अब

नीले अंबर में उड़ना है

जिस अम्बर में कहीं

ना कोई बेड़िया होगी

ना किसी के हाँथो में

तुम्हारे जीवन की 

पतंगों की डोरिया होगी 

पतंगों की भांति उड़ना है अब

उड़ते जाना है अब बाज की तरह

खुले आसमान में उड़ना है

ज़िंदगी के सफर में हमें

अब जीत के ही दम लेना है

सामाजिक बंधनो से मुक्त हो

अपने जीवन को 

मुकाम तक पहुंचाना है

उस मुकाम को पाकर

मिसाल बन जाना है

हमें उन सबके लिए

जिन्हें आघात बहुत गहरा मिला।

--- लवली आनन्द

मुजफ्फरपुर , बिहार