"इतनी लंबी लंबी भी न फेंका कीजिए साहब " (अरण्यरोदन)

हर इंसान कभी न कभी कुछ न कुछ लंबा-लंबा फेकता ही है कभी खुशी में तो कभी भावनाओं के अतिरेक ज्वार में फेक ही देता है !पर कभी-कभी अतिरेक में कुछ बोलना ..कैसे गले की हड्डी बन जाता है यह मुझ गरीब से ज्यादा कौन समझ सकता है ! बुरा हो इन नेताओं का जो इनकी देखा देखी मुझे भी यह रोग लग गया और मैं भी अपनी पत्नी के सामने लंबी लंबी फेंक गया.. मैं भूल गया कि देश की सरकार और घर की सरकार में बहुत अंतर होता है।


 नेता लंबी-लंबी लोकलुभावन वादे फेंक कर ही चुनाव में वोट रूपी धन बटोरते हैं .सरकार बनाते हैं, सत्ता सुख पाकर दिन  मजे और चैन से गुजारते हैं.. मैं भी इन नेताओं के दिखाएं अच्छे दिनों की आस में अपने घर की सरकार के सामने लंबी-लंबी फेंक दिया कि -" इस बार बच्चों की गर्मी की छुट्टियां होने दो सबको शिमला घुमाने ले जाऊंगा " छः महीने पहले किया गया यह मौखिक वादा तो खुशी के अतिरेक में किया गया था पर मुझे क्या पता था यह मौखिक वादा स्टांप पेपर पर लिखवाए गए मजनून से ज्यादा मुझे पानी पिला सकता हैं पत्नी देवी के दिमाग के स्टांप पेपर पर लिखा यह मजनून गर्मियों की छुट्टियां आते ही बोतल से जिन्न की तरह बाहर निकल आया है और वह मुझे घर में ही पूरा देश घुमा रही है !! अब इस कमरे से उस कमरे तक भागता फिर रहा हूं.. पर पत्नी के व्यंग बाणो से राहत मिलने की कोई उम्मीद नहीं है ..।घर की अदालत में मिली सजा में ना तो जमानत का प्रावधान होता है ना पैरोल पर बेल मिलती है ।


कभी-कभी तो मुझे लगता है कि घर की सत्ता में भी सरकारी विभागों की तरह कई विभाग होने चाहिए अर्थात दो चार पत्नियां तो होनी ही चाहिए जब एक से गुस्सा हो तो दूसरे के पास जाए जैसे सरकारी  विभाग होता है वैसे ही.. ताकि मुझ जैसे  आम आदमी को कुछ राहत मिल सके ..पर फिर ध्यान आया ...हे ईश्वर कई दिनों से जली कटी बातें और जले भुने खाने को खा खा कर मेरा दिमाग सठिया गया है अगर पत्नी को मेरे अतरंगी ख्यालों के बारे में भनक भी मिल गई तो मेरी पूरी दुनिया को उलट-पुलट कर के रख देगी. जिस प्रकार महंगाई और बेरोजगारी ने देश को उलट-पुलट कर के रखा हुआ है।और मैं कोई नेता तो हूं नहीं कि जनता से एक बार वोट लेने के बाद"  गूलर का फूल " बन जाऊं या " ईद का चांद बन जाउ हर वक्त तो उससे आमना-सामना होना है ।


ऐसा नहीं है कि मेरी मंसा नहीं है कि मैं अपनी बीवी और अपने बच्चों को शिमला घुमाने नहीं ले जाना चाहता हूं!! पर दिनों दिन जिस प्रकार महंगाई बढ़ रही है और रुपए का अवमूल्यन हो रहा है मेरी तनख्वाह तो उतनी की उतनी ही है जो अब खर्चों पर ही पूरा नहीं पड़ रही है तो मैं परिवार को सैर सपाटे और घुमाने और एक हाथी के जैसा भारी-भरकम खर्च कहां से उठाऊ?? जिस प्रकार लंबे-लंबे फेकू नेताओं को जनता के दुख से मतलब नहीं है... उसी प्रकार मेरी बीवी को भी मेरी दुख गाथा से कोई मतलब नहीं है उसके सपने में तो इस समय सिर्फ पहाड़ों की बर्फ, गर्मी से छुटकारा और सेल्फी खींच कर अपने फ्रेंड सर्किल को दिखाने  और अपने फेसबुक व्हाट्सएप और इंस्टाग्राम के वाल को सजाने का ख्याल से मतलब है.. मेरा तो अपने देश के नेताओं से यही कहना है साहब इतना लंबा लंबा खुशहाली वाले सपने मत दिखाइए आप लोग तो निकल लेंगे पर हम जैसे असहाय पतियों की दुर्दशा हो जाएगी आप लोगों के लपेटे में आकर....।


रेखा शाह आरबी

बलिया( यूपी)