नौकरी

नौकरी जीने का सार,

नौकरी बिन सब बेकार

कमाऊंँ लगता सबको प्यार,

निठल्ला  फिरता दर दर मारा।

नौकरी से इज्जत है होती

घरवाली भी खुश हैं होती।

नोट गिनवाता पति प्यारा,

पेटीएम है बने सहारा।

नौकरी के नियम कानून बड़े

दोनों मिलकर कमाने चले।

खर्चा  दोनों मिलकर करते ,

तभी ऐश से दोनों रहते।

नौकरी का नाम दूसरा

जी हजूरी बाँस की करते।

काम तन्मयता से करते

तभी जीवन के सुख मिलते।

उन्नति तभी मिलती है यहां पर

मेहनत जब हम अपनी दिखाते।

चाटुकारिता का है जमाना

चापलूसी भी हम कर जाते

काम अगर गलत है  होता

मालिक की डांट सुननी पड़ती

किसी ने सही कहा जनाब

नौकरी के नौ काम

  दसवां काम जी हजूरी साहब।

              रचनाकार ✍️

              मधु अरोरा