रिश्तों को बुनाई

कच्चे रेशम की डोरी से ,

रिश्तों को बुन डाला,

द्वार सभी खोले नहिं डाला,

चतुराई का ताला।

मुखड़े पर मुस्कान सहेजे,

अपनो को दुलराती,

कान्हा की यसुधा माता सा,

नेह सदा ही पाती।

संबंधों के  इस  उपवन में, 

गंगाजल ही डाला,

द्वार सभी खोले नहिं डाला,

चतुराई का ताला।

आस सँग विश्वास के मोती,

रही शान से बोती,

सिन्धु सा धैर्य समेटे हिय में,

बनी दीपक की ज्योति।

गीता की नेहिल वाणी से,

चहका भोर उजाला,

द्वार सभी खोले नहिं डाला,

चतुराई का ताला।

रिश्तों को रखना सहेज यदि,

छुपा पीर मन राखो,

समझो दूजों का दुःख लेकिन,

अपने को नहिं बाँटों।

अपनी जैसी कहता तोता,

जब तक दाना डाला,

द्वार सभी खोले नहिं डाला,

चतुराई का ताला।


सीमा मिश्रा, बिन्दकी-फतेहपुर