नशा है समाज-वेदना

नशा-व्यसनी स्व  से  निज  स्व

का  साध  लें  जो  गहन एकत्व।

तो शायद हो  निदान, इस दारुण

भू  वेदना का हो दूर दाहकत्व।


जो है महा शक्तिमान, सिरमौर

यह दुर्बलता करती उसे बेठौर।

पर्यावरण घर बाहर,हो एकाकी

रहताअव्यक्त,बन नशे का कौर।


नेतृत्व,हित-चिंतन है नशामुक्ति,

बंद करेंव्यवसाय,हैविचार-शक्ति?

हैं, राजस्व-हानि से भयभीत हम

कायर ऐषणा है, यह अर्थ-भक्ति।


समाज सन्दर्भ नहीं, यह है त्रासदी,

अपकृत नव-पीढ़ी हो रही उन्मादी।

डेढ़ कोटि मन होंगे  कौमुदी,जो

मादक द्रव्य उद्यमिता में तालाबंदी,


तार बुराई का है जटिल अंतर्जाल,

बिखरते कुटुंब,दर्द झेलते गोपाल।

स्वर्णिम अर्द्धचन्द्र त्रिकोण में दबा,

तस्करी अर्थ-तंत्र दुखी नौनिहाल।


विषय  बनता यह, राष्ट्र सरोकार,

रूप   हो  रहा है  दैत्याकार।

रोजगार असुरखा स्नेह-अभाव,

से बढ़ रहा मद द्रव्य कारोबार।


बना ये प्रश्न समाज न्याय,समता,

लोप होती जीवन मूल्य गरिमता

ज्ञान चपलता मैत्री, मेल चेतना ,

मांगे पुनर्वास, क्या है तंत्र-अस्मिता ?


@ मीरा भारती

पटना, बिहार