हम ‘बाइक’ दे चुके सनम!

पेट्रोल की बढ़ती कीमतों के बीच बाइक का चोरी होना लॉटरी लगने से कम थोड़ी न है। चोरी न होती तो उसकी आवभगत के लिए आए दिन पेट्रोल का चढ़ावा चढ़ाना पड़ता। कुछ चीज़ें खरीदने तक सवारी करने योग्य रहती हैं। बाद में पता ही नहीं चलता कि वह हम पर सवारी कर रही हैं या हम उन पर। आज को बाइक चोरी हुए आठ साल बीत गए। उम्मीद और शीशा कभी भी टूट सकता है। न जाने हम किस कांक्रिट के बने थे कि पिछले आठ साल से उसी के बारे में सोचते रहते। वह क्या है न कि कमाकर खरीदी गई ईंट फोकट के ताजमहल से कहीं अधिक कीमती होती है। धुंधली ही सही उसकी याद बनी रही। मानो यह घटना मस्तिष्क पटल पर पेंसिल से नहीं सीडी मार्कर से लिख दी गई हो। जो मिटने का नाम ही नहीं ले रही थी।     

            फिर एक दिन बिन जड़ के पेड़ और बिन हाथों के ताली बजाने वाली खबर आई। डाकिया गुम हुई बाइक का एक चालान थमा गया। यह चालान ठीक वैसा ही था जैसे खाए कोई स्वाद बताए कोई। फिर भी एक बात की दाद देनी पड़ेगी कि आठ साल में केवल एक चालान! हो न हो चलाने वाले का हाथ एकदम साफ है। समझ नहीं आ रहा था कि चलाने वाले की तारीफ़ करूँ या जाकर पुलिस थाने में शिकायत दर्ज कराऊँ। कुछ देर सोचा और पहुंच गया पुलिस थाने चालान लेकर। चालान देखकर पुलिस भौंचक्का रह गई। उन्होंने चीज़ों को लूटते, चोरी होते या फिर गायब होते हुए देखा है। मिलते हुए बहुत कम बार देखा है।

            बाइक चुराने वाले को पुलिस थाने में बुलाया गया। वैसे थाने में किसी को बुलाया नहीं जाता बल्कि पकड़कर या घसीटकर लाया जाता है। चूंकि चुराने वाला पुलिस वाला ही था, सो उसे बाइक के साथ बुलाया गया। थाने की चारदीवारी में अपनी बाइक को देख खुशी का ठिकाना न रहा। सोचा आज अपने साथ ले जाऊँगा। तभी जैसे लगा कि बाइक मुझसे कुछ कहना चाहती है। मैं ‘हम दिल दे चुके सनम’ फिल्म के अजय देवगन की तरह ऐश्वर्या रूपी बाइक की बातें सुनने लगा। वह कहती रही – जानते भी हो पेट्रोल की कीमत क्या है! क्या इतना महंगा पेट्रोल मुझ पर खर्च सकते हो? मैं उस पुलिस वाले के साथ बहुत खुश हूँ। उसके एक महीने की ऊपरी कमाई तुम्हारे साल भर की कमाई से कहीं अधिक है। उसके रौब से ही पेट्रोल बंक वाले मेरी टंकी भर देते हैं। हर समय मुझे चमकाने के लिए कोई न कोई तैयार रहता है। वह मुझे किसी चीज की कमी नहीं होने देता। यदि तुम मुझसे सच्चा प्यार करते हो तो मुझे अपने साथ ले जाने की बजाय उस पुलिस वाले को ही सौंप दोगे।

            यह सुन मैं एक क्षण के लिए अवाक् रह गया। लेकिन दूसरे ही क्षण थानेदार के पास पहुँचा और अपना केस वापस ले लिया। मैंने चोर पुलिस वाले से इतना भर कहा कि कोई भी चीज हैसियत वाले के पास ही होनी चाहिए। यह बाइक आपके पास ही चमचमा सकती है। बस मेरी आपसे इतनी सी विनती है कि इस पर फिर कभी चालान का बदचलन दाग न लगे। वैसे मैं उसका उतना ख्याल नहीं रख पाऊँगा जितना आप रख सकते हो। पुलिस वाला खुशी-खुशी बाइक लेकर चला गया। उस दिन मुझे एक बात और समझ में आई कि सभी फिल्में सभी लोग नहीं देखते। नहीं तो उसे सलमान खान बनने में देर नहीं लगती और न ही हम ‘बाइक’ दे चुके सनम! कहलाते।  

डॉ. सुरेश कुमार मिश्रा ‘उरतृप्त’, मो. नं. 73 8657 8657