चाइल्ड लाइन के प्रयासों से बाल विवाह में आ रही कमी, कुप्रथा पर पूर्ण विराम के लिए साझा प्रयासों की जरूरत

 युग जागरण न्यूज़ नेटवर्क 

केस- 1-

ब्यूरो , सीतापुर : जनपद सीतापुर में चाइल्ड लाइन के प्रयासों से बाल विवाह में आ रही कमी,  कुप्रथा पर पूर्ण विराम के लिए साझा प्रयासों की जरूरत है । जिससे बच्चों के भविष्य को संवारने का काम कर रही संस्था चाइल्ड लाइन संस्था के मोबाइल नंबर पर एक फोन आता है। जिला समन्वयक फोन रिसीव करते हैं तो उन्हें जानकारी दी जाती है कि मिश्रिख तहसील क्षेत्र के एक गांव में कक्षा 10 की एक नाबालिग बेटी का विवाह कराया जा रहा है। जिसकी उम्र अभी 17 साल से भी कम है। इस सूचना के बाद संस्था की टीम ने तुरंत ही बाल कल्याण समिति को मामले की सूचना दी और मौके पर पहुंच कर पड़ताल की। हाई स्कूल प्रमाण पत्र के अनुसार जिस बेटी का विवाह होने वाला था उसकी उम्र अभी मात्र 17 साल ही थी। जिसके बाद बेटी के पिता, भाई एवं अन्य परिवारीजन को थाने पर लाया गया, जहां पर बेटी के पिता और भाई ने पुलिस को लिखित रूप में दिया कि बेटी के बालिग होने के बाद ही उसकी शादी करेंगे।

केस- 2-

कुछ ऐसी ही कहानी है सिधौली तहसील के बन्नी संतरा गांव की, लखनऊ के एक इंटर कॉलेज की कक्षा 10 की छात्रा के विवाह की सूचना जब संस्था को मिली ताे टीम ने बाल कल्याण समिति को सूचना देकर मौके पर पहुंची। पड़ताल के दौरान इस बेटी की मां से जब उसकी उम्र पूछी तो उन्होंने बताया कि मेरी बेटी की उम्र 17 साल से कम है। जिस पर संस्था के सदस्यों ने उन्हें समझाया कि बाल विवाह कानूनन अपराध है। इससे आपके पूरे परिवार को जेल हो सकती है, साथ ही आपकी बेटी के स्वास्थ्य पर भी विपरीत प्रभाव पड़ेगा। जिस पर वह और परिवार के अन्य सदस्य सहमत हो गए और उन्होंने कहा कि जब मेरी बेटी 18 साल की पूरी हो जाएगी, तभी हम उसका विवाह करेंगे।  और सीतापुर में यह दो उदाहरण तो प्रतीक मात्र हैं, जिले चाइल्ड लाइन संस्था पिछले दो सालों में दर्जनों बेटियों को बालिका वधू बनने से रोकने का काम किया है। संस्था के जिला समन्वय सर्वेश शुक्ला कहते हैं कि बीते सालों में इस कुप्रथा पर काफी हद तक विराम लगा है, लेकिन बाल विवाह रोकने के लिए समाज के सभी लोगों को आगे आने की जरूरत है। उन्होंने बताया कि बाल विवाह कम होने से कम उम्र में मां बनने वाली महिलाओं की संख्या में भी गिरावट आई है। एनएफएचएस-4 और 5 के आंकड़ों का तुलनात्मक अध्ययन करने से पता चलता है कि अब से चार साल पहले वर्ष 2015-16 में 15 से 19 साल की आयु वर्ग की 7.3 प्रतिशत महिलाएं या तो मां बन जाती थी या फिर वह गर्भवती हो जाती थीं। लेकिन वर्ष 2020-21 में इसी आयु वर्ग की महिलाओं के संबंध में यह आंकड़ा घटकर 3.4 प्रतिशत रह गया।  क्या कहती हैं विशेषज्ञ : जिला महिला चिकित्सालय की अधीक्षक व स्त्री एवं प्रसूति रोग विशेषज्ञ डॉ. सुषमा कर्णवाल का कहना है कि बाल विवाह के चलते कम उम्र में ही लड़कियां मां भी बन रही हैं। कम उम्र में गर्भधारण करने से प्रजनन तंत्र को नुकसान पहुंच सकता है। ऐसे में मां और बच्चे दोनों के स्वास्थ्य पर विपरीत प्रभाव पड़ता है। किशोरी के गर्भधारण के साथ ही उसे डायबिटीज के साथ कई और स्वास्थ्य समस्याएं हो सकती हैं। कम उम्र में मां बनने पर बच्चे के प्रीमैच्योर होने की आशंका भी बढ़ जाती है। इसके साथ ही बच्चे का वजन भी कम हो सकता है और बच्चे का शारीरिक और मानसिक विकास भी प्रभावित हो सकता है। कम उम्र में मां बनने से कई बार करियर ग्रोथ पर असर पड़ता है जिसके चलते मां तनाव में भी आ सकती हैं।