"जिंदगी की वैलिडिटी..."

घंटी... थाली... दीया... बाती...

शंखनाद इन्हीं के साथ

कथा अनाथ इन्हीं के साथ

पत्थर, कंकड़, गिट्टी

कीचड़ पानी ये मिट्टी

खत्म हो गई जिंदगी की वैलिडिटी ।।


मेड इन चाइना

दिखाकर आईना

देखने में सुंदर परन्तु

नहीं है कोई गारंटी ।

समस्त संसार

हुआ हाहाकार

इन्हीं के साथ इन्हीं के हाथ

ख़त्म हो गई जिंदगी की वैलिडिटी ।।


वैश्विक महामारी कोरोना है 

हमेशा हाथ धोना है 

कभी नौकरी से कभी सैलरी से 

तांक झांक वाली गैलरी से 

कभी आजादी से कभी सिस्टम से 

सभी चीजों से धोना है हाथ 

गुम हो चुका है जिंदगी की स्लेटी ।

खत्म हो गई है जिंदगी की वैलिडिटी ।।


हुआ चुनाव कई चरणों में

पहले वो तुम्हारे चरणों में

अब तुम जाओ उसके

चौखट उसके चरणों में 


जब चुनाव था तब कोरोना नहीं था

अब कोरोना है चुनाव भी नहीं है

क्या लेना देना अब उन्हें

ये शहर ये राज्य उसके इलाके में नहीं है

तुमने किस में छाप लगाया

क्या है वारंटी ।

खत्म हो चुका है तुम्हारी

जिंदगी की वैलिडिटी ।।


दवा नहीं वेक्सीन नहीं

बेड नहीं आक्सीजन नहीं

मरने के बाद भी अंतिम

क्रिया कर्म की नहीं गारंटी ।

यही है तुम्हारी जिंदगी की वैलिडिटी ।।


स्वरचित एवं मौलिक

मनोज शाह 'मानस'

नई दिल्ली