क्या जाति की बात करना हिंदू द्वेषी होना है !

इस साल की शुरूआत में कैलिफोर्निया स्टेट यूनिवर्सिटी की तरफ से उनकी भेदभाव संबंधी नीति में जाति को भी जोड़ा गया है। अमेरिका की यह सबसे बड़ी पब्लिक यूनिवर्सिटी है, जिसके 23 विभिन्न परिसर हैं और हजारों की संख्या में छात्र वहां पढ़ते हैं। अब वहां अगर दलित छात्रों के साथ कोई अन्याय होता है तो उसकी शिकायत वह वहां कर सकेंगे।

जाति का सवाल एक प्रचंड मसला है, सैद्धांतिक तौर पर और व्यावहारिक दोनों स्तरों पर। व्यावहारिक तौर पर देखें तो वह एक ऐसी संस्था है जो जबरदस्त प्रभाव पैदा करती है। वह एक स्थानीय समस्या है, लेकिन वह काफी हानि पहुंचा सकती हैय जब तक भारत में जाति का अस्तित्व है, हिन्दू शायद ही कभी रोटी बेटी का व्यवहार करेंगे या बाहरी लोगों के साथ सामाजिक अंतर्कि्रया करेंगे य और अगर हिन्दू पृथ्वी के अन्य इलाकों में पहुंचेंगे तो भारतीय जाति विश्व की समस्या बन सकती है।

 वर्ष 1916 का साल था, जब कोलम्बिया युनिवर्सिटी के मानववंश विज्ञान विभाग के सेमिनार में बोलते हुए युवा अम्बेडकर ने यह सटीक भविष्यवाणी की थी कि किस तरह श्जाति विश्व की समस्या बन सकती हैजब हिन्दू भारत के बाहर यात्रा करेंगे और वहां बसेंगे। एक सदी से अधिक का वक्फा गुजर गया और हम देख रहे हैं कि किस तरह जाति को लेकर उनकी यह भविष्यवाणी भी सही साबित होती दिख रही है।

एक अग्रणी कॉर्पोरेट का मसला शायद यही बता रहा है। ऐेसे मौके बहुत कम आते हैं जब कोई न्यूज एग्रीगेटर (संकलक)- जो दुनिया भर के हजारों प्रकाशकों एवं पत्रिकाओं से खबरों, आलेखों को अपने पाठकों तक पहुंचाता रहता है, वह खुद सुर्खियां बने। विश्व की सबसे बड़े न्यूज एग्रीगेटर में शुमार किए जाने वाले गूगल न्यूज के साथ पिछले दिनों यहीं वाकया हुआ, जब वह खुद दुनिया भर के अखबारों, वेबसाइटस पर खबर बना, जब जाति के प्रश्न पर अपने ही कर्मचारियों को संवेदनशील बनाने के लिए कंपनी द्वारा ही आयोजित व्याख्यान को आननफानन रद्द कर दिया गया। 

याद रहे डॉ0 अम्बेडकर का जिस माह में इन्तघ्काल हुआ, उस अप्रैल माह को केन्द्रित करते हुए पिछले कुछ सालों से पश्चिमी जगत में दलित हिस्ट्री मंथ अर्थात दलित इतिहास के महिने में कार्यक्रमों का आयोजन होता है, मकसद यही होता है कि शेष आबादी को जो दलित उत्पीड़न की विशिष्ट समस्या से, उसके संघर्षों से, उसकी जद्दोजहद से परिचित नहीं है, वह चीजों को समग्रता में जाने। गूगल न्यूज द्वारा आयोजित इस कार्यक्रम में सुश्री थेनमोजी सुंदराराजन जो अमेरिका में ही दलित अधिकारों की हिफाजत के लिए लंबे समय से सक्रिय रही हैं तथा- जो इक्वालिटी लैब्ज नामक नॉनप्राफिट अर्थात एक स्वयंसेवी संस्था की अग्रणी हैं-को बात रखनी थी। 

याद रहे दलित अधिकारों की हिफाजत के लिए उनकी स्थिति के दस्तावेजीकरण से लेकर उन पर हो रहे अन्यायों को दूर करने के लिए वह मुहिमों में शामिल रहती आई हैं। सब कुछ तय था और अचानक खबर आई कि सुश्री थेनमोजी का यह प्रस्तावित व्याख्यान कंपनी की तरफ से रद्द कर दिया है। मामला यहीं खतम नहीं हुआ, इस आकस्मिक फैसले में कंपनी की एक सीनियर मैनेजर- जिन्होंने सुश्री थेनमोजी से संपर्क किया था और उन्हें निमंत्रण दिया था- उन्होंने कंपनी से इस्तीफा दिया। 

सबसे ताज्जुब की बात इसमें यह भी उजागर हुई है कि इस कॉर्पोरेट समूह के प्रमुख भारतीय मूल के सुंदर पिचाई ने- जिनसे इतनी तो उम्मीद की जा सकती थी कि वह जाति की समस्या से वाकिफ होंगे- इस मामले में बिल्कुल मौन मना कर रखा और एक तरह से जाति की जीवन्त समस्या के प्रति अपनी गहरी असंवेदनशीलता और पूर्वाग्रह का प्रदर्शन किया। 

यह जानना भी महत्वपूर्ण है कि अमेरिका की अग्रणी कॉर्पोरेट टेक कम्पनियों में, जार्ज फ्लॉयड की हत्या के बाद तथा ब्लैक लाइवज मैटर के आंदोलन के चलते उठी सरगर्मियों के चलते, एक तरह से सामाजिक मुद्दों को लेकर एक नयी संवेदनशीलता जागती दिख रही है और इसी के तहत कई कंपनियों ने इसी मुद्दे पर अपने कर्मचारियों एवं अधिकारियों से वार्तालाप करने के लिए इसके पहले सुश्री सौंदराराजन को आमंत्रित किया था। 

माईक्रोसाफट, सेल्सफोर्स, एअरबीएनबी, नेटफिलक्स और एडोबे जैसी अग्रणी कंपनियों द्वारा अपने यहां ली गई इस पहल की तारीफ भी हो रही थी। बाद में पता चला कि कंपनी द्वारा लिया गया यह निर्णय साफ तौर पर दबाव के तहत लिया गया, जिसके पीछे गूगल न्यूज के उन मुलाजिमों द्वारा चलाए गए एक जहरीले अभियान का हाथ था, जिन्होंने आमंत्रित वकता को हिन्दू द्रोही या हिन्दू द्वेषी कहलाते हुए जबरदस्त मुहिम चलाई थी। 

कंपनी के लीडरों और गूगल इंटरनेट तथा उसके हजारों कर्मचारियों की ईमेल सूची में इसे प्रमाणित करने के लिए तमाम दस्तावेज साझा किए गए थे। जाहिर सी बात है इस मुहिम के पीछे भारतीय मूल के कंपनी के कर्मचारी आगे थे-जिनका बहुलांश कथित ऊंची जातियों से आता है। 

तयशुदा बात है कि उन्हें इस बात से कतई गुरेज नहीं था कि अमेरिका में बसे 15 लाख से अधिक भारतीय-जो अपने आप को मॉडल माइनॉरिटी कहलाने में फख्र महसूस करते हैं-जिनमें दलित अमेरिकियों की आबादी डेढ़ प्रतिशत से अधिक नहीं हैं, ऐसी घटनाओं में इजाफा हो रहा है जहां दलित अमेरिकियों को अपने कथित ऊंची जाति के सहयोगियों के हाथों जातीय उत्पीड़न, गाली-गलौज आदि का सामना करना पड़ता है, वहां इस मसले पर अब कुछ करने की आवश्यकता है। सौंदरराजन के खिलाफ जो संगठित मुहिम चलाई गई तथा गूगल प्रबंधन को दबाव में लाया गया, उसके तेवर को देखते हुए यही प्रतीत हो रहा था कि यह अब कोई उपरोक्त प्रतिष्ठान ध्संगठन के अंदर का मामला नहीं रहा था। 

इस पूरे घटनाक्रम पर वॉशिंग्टन पोस्ट ने बाकायदा टिप्पणी की कि आप्रवासी भारतीयों के रास्ते अब किस तरह हिन्दू राष्ट्रवादी आंदोलन अमेरिका के गूगल न्यूज तक भी पहुंच गया है। ऐसे विभिन्न हिन्दुत्ववादी संगठन तथा रूढ़िवादी हिन्दू संगठन जो इसके पहले भी वहां इक्वालिटी लैब्ज और दलित अधिकारों की हिमायत के लिए सक्रिय तंजमों के साथ कार्यस्थलों पर दलित अमेरिकियों को झेलने पड़ते भेदभाव तथा स्कूली पाठ्यक्रम की अंतर्वस्तु जैसे मसलों पर पहले भी उलझ चुके हैं, वह भी इस मुहिम में पिछले दरवाजे से सक्रिय रहे हैं। सिस्को सिस्टम में जातिगत भेदभाव का मसला अभी चर्चा में ही है।

आप कह सकते हैं कि गूगल न्यूज द्वारा जाति के प्रश्न पर व्याख्यान को रद्द करना या अपने संगठन के अंदर मौजूद जातिगत पूर्वाग्रहों पर चर्चा से भी इन्कार करना, इन बड़े कार्पोरेट्स के असली चरित्र को उजागर करता है। विडम्बना ही है कि गूगल न्यूज कोई अपवाद नहीं है। महज दो साल पहले सिस्को सिस्टम्स- जो सॉफ्टवेयर के क्षेत्र में एक दूसरा बड़ा कार्पोरेट समूह है- एक दलित कर्मचारी द्वारा उसके दो वरिष्ठ मैनेजरों के हाथों- जो दोनों कथित ऊंची जाति से ताल्लुक रखते थे- झेलने पड़ रही जातिगत प्रताड़ना की घटना से सुर्खियों में था। 

इस बात के दस्तावेजी प्रमाण उपलब्ध थे कि किस तरह वेतन में बढ़ोतरी रोक कर या महत्वपूर्ण निर्णय प्रक्रियाओं से उसे बाहर करके इन दो मैनेजरों ने अपने पूर्वाग्रहों का ही प्रदर्शन किया था। बाद में इस घटना से उद्वेलित इक्वालिटी लैब्ज, अंबेडकर इंटरनेशनल सेन्टर तथा अन्य संगठनों ने अपनी आवाज बुलंद की तथा कैलिफोर्निया राज्य की चुप्पी पर सवाल उठाया। 

कैलिफोर्निया राज्य ने फिर नागरिक अधिकार कानून-जो अश्वेतों द्वारा समान अधिकार हासिल करने के लिए 60 के दशक में चली व्यापक मुहिम का नतीजा थी- के तहत कंपनी पर मुकदमा कायम हुआ जो आज भी चल रहा है। ऐसी घटना न केवल एक नजर बनेगी, जिससे प्रेरित होकर अन्य दलित अमेरिकी-जो अपने यहां प्रताड़ना झेल रहे हैं- भी अपनी आवाज बुलंद कर सकते हैें। 

इतना ही नहीं, यह व्यापक हिन्दू एकता के हिन्दुत्ववादी समूहों के फर्जी दावों की हवा निकाल देगा और हिन्दुओं की आपसी दरारों को फिर एक बार जनता के सामने लाएगा।चाहे गूगल न्यूज का मसला हो, कैलिफोर्निया राज्य के पाठों की पुनर्रचना करनी हो या सिस्को सिस्टम में दलित कर्मचारी के साथ जारी भेदभाव को जुबां देनी हो, आप बार-बार यही पाएंगे कि इक्वालिटी लैब्जस, अम्बेडकर इंटरनेशनल सेन्टर आदि संगठनों तथा अन्य हिन्दुत्ववादी समूहों के बीच- जिनमें से कई राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की राजनीति से इत्तेफाक रखते हैं - एक दूरी बनी है। यह दूरी बदलाव की ताकतों एवं यथास्थिति की ताकतों के बीच की दूरी के तौर पर मौजूद रहेगी, जब तक चीजें गुणात्मक तौर पर नहीं बदलतीं। 

इस बात पर जोर दिया जाना जरूरी है कि विचारों के इस संघर्ष में जहां वास्तविक न्याय और समानता के मुद्दे आगे आ रहे हैं और व्यापक एकता के फर्जी दावों को लेकर- जो समाज के सदियों पुरानी दरारों पर परदा डालना चाहते हैं- चुनौतियां बढ़ रही हैंय हम यह भी पा रहे हैं कि जाति एवं उससे जुड़े भेदभावों की चर्चा करने या उन्हें संबोधित करने के लिए नए-नए रास्ते भी खुल रहे हैं।

 इस साल की शुरूआत में कैलिफोर्निया स्टेट यूनिवर्सिटी की तरफ से उनकी भेदभाव संबंधी नीति में जाति को भी जोड़ा गया है। अमेरिका की यह सबसे बड़ी पब्लिक यूनिवर्सिटी है, जिसके 23 विभिन्न परिसर हैं और हजारों की संख्या में छात्र वहां पढ़ते हैं। अब वहां अगर दलित छात्रों के साथ कोई अन्याय होता है तो उसकी शिकायत वह वहां कर सकेंगे।