झुर्रियां नहीं,, अनुभव

चश्में के पीछे से झांकती हुई

एक जोड़ी

ये थकी थकी सी आंखें,

माथे पर बिखरे हुए अधपके बाल

और,,

चेहरे पर रेंगती हुई

महीन झुर्रियां,,,

प्रौढ़ावस्था की नहीं, वरन्

जीवन के अनगिनत अनुभवों को

साझा करती हुई

कविताएं ही हैं,


सुनों

मत करना तिरस्कार ,

एक बार कोशिश अवश्य करना

इनको पढ़ने और समझने की !!


नमिता गुप्ता "मनसी"

मेरठ , उत्तर प्रदेश