" विश्व पर्यावरण दिवस "

मन हुआ है नया गीत लिखूँ

लिखते-लिखते कुछ कदम चलूँ 

भरी दोपहर में नंगे पाँव चलूँ 

थोड़ा सूरज में तपूँ  

फिर पर्वत पर चढ़ कर 

नदी सँग बहूँ 

वृक्षों का गरदन हिला- हिलाकर 

किया गया अभिवादन स्वीकार करूँ 

डालियों को हाथों से झटक कर 

सुर नया कोई दूँ 

गिरते पत्तों को उठा कर 

रंग उनके देखती रहूँ 

फ़ूलों के रंग चुरा कर 

तितली समान परिधान बदलूं

फिर किसी तालाब में

पत्थर फेंक कर तरंगें गिनूँ 

छोटी-छोटी मछलियों की 

उथल-पुथल में उलझ जाऊँ  

सागर की लहरें गिनूँ 

तल में जाकर 

किसी सीप में छुप जाऊँ 

जैसे बालक छुप जाता है 

माँ की गोद में 


 वंदना जैन 

  मुंबई